गणगौर पर्व पर संगोष्ठी एवं छायाचित्र प्रदर्शनी का आयोजन

मेवाड़ में गौर, गणगौर, गवरी और गौरजा की मान्यताएं
उदयपुर।
इतिहास विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विवि. के वरिष्ठ सहायक आचार्य डॉ. पीयूष भादविया ने बताया कि इतिहास विभाग द्वारा ‘राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत तथा नारी सम्मान का प्रतीकः गणगौर उत्सव‘ विषय पर संगोष्ठी एवं छायाचित्र प्रदर्शनी आयोजित की गई। सर्वप्रथम विभागाध्यक्ष प्रो. दिग्विजय भटनागर ने वक्ताओं का स्वागत किया तथा डॉ. पीयूष भादविया ने विषय प्रवर्तन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी में वक्ताओं का कहना था कि गणगौर पर्व केवल पूजा व सवारी का ही उत्सव नहीं बल्कि आत्मिक संबंधों के स्थाईत्व का सुन्दर अवसर भी है। पर्यावरणविद् महेश शर्मा ने 150 वर्षों के गणगौर पर्व के चित्रों की चलित प्रदर्शनी के दौरान कहा कि गणगौर मेवाड़ का महत्वपूर्ण पूजन पर्व है। यह परम्परा क्षीण होते दापम्त्य के जीवन के दौर में मान-सम्मान समर्पण के साथ संवाद की सुन्दर पहल का पर्व भी है।
प्रो. प्रतिभा ने अपने अनुभवों के आलोक में गणगौर पर्व का परिचय दिया और कहा कि यह पर्व हमारे सामाजिक ताने-बाने और संस्कारों की सुरक्षा का अच्छा उदाहरण है। इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने गौरजा, गौर, गवरी और गणगौर की भूमि वाले मेवाड़ के अनेक प्रसंगों को रेखांकित किया और कहा कि बालिकाओं के मन में चयन, वरण और पाणिग्रहण के बीजारोपण का भाव इस पर्व के साथ जुड़ा है। उन्होंने बंजारों के कारवाओं के साथ देशभर में प्रसारित हुई गणगौर परम्परा के अनेक पक्ष विवेचित किये और कहा कि गणगौर हरण, श्रृंगार और सवारी के प्रसंग बताते है कि यह पर्व सांस्कृतिक सम्मान का सूचक है। जिसके बीज देवी पुराण, निर्णय सिंधु आदि में मिलते है।
सुखाड़िया विवि. से गणगौर पर पीएच.डी. कर चुकी डॉ. विनिता वागरेचा ने गणगौर के गीतों व कथाओं का मनौवैज्ञानिक पक्ष रखा और कहा कि वर्जानाओं के बीच नारी की अभिव्यक्ति इस पर्व प्रसंग पर मुखर हो उठती है। रंगकर्मी विलास जानवे ने मेवाड़ से महाराष्ट्र तक गणगौर की व्याप्ति को रेखांकित किया। डॉ. चन्द्रप्रकाश चित्तौडा द्वारा निर्मित गणगौर पर लघुपुस्तिका तथा चॉक पर निर्मित गौरी का भी अनावरण किया गया। इस अवसर पर डॉ. मनीष श्रीमाली, डॉ. मोहित शंकर सिसोदिया, डॉ. अदिति सोनी, डॉ. प्रवेश कुमार, कृति, दीपक, ऋतिक, परीक्षिता सिंह आदि शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।