अत्याधुनिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक और कदम
उदयपुर। कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ पर खड़ी कर देती है, जहां हर रास्ता बंद नजर आता है। चारों तरफ सिर्फ अंधेरा ही दिखाई देता है और फिर अचानक एक तेज रोशनी भर जाती है। भीलवाड़ा निवासी 38 वर्षीय युवराज और उनके परिवार के लिए वर्ष 2025 का अंत कुछ ऐसा ही था। दो छोटे बच्चों के पिता युवराज को नवंबर 2025 में अचानक कमर में दर्द शुरू हुआ। शुरुआत में इसे सामान्य परेशानी समझा गया, लेकिन जब दर्द लगातार बना रहा तो जांच कराई गई। रिपोर्ट में पहली बार पता चला कि उनके दोनों गुर्दे गंभीर रूप से प्रभावित हो चुके हैं।
इसके बाद शुरू हुआ अस्पतालों और शहरों का लंबा सफर। कई विशेषज्ञों से परामर्श लिया गया। अहमदाबाद में 15 दिन इलाज चला, लेकिन बीमारी लगातार बढ़ती गई। देखते ही देखते, डायलिसिस शुरू करना पड़ा।
हर नई रिपोर्ट के साथ परिवार की चिंता बढ़ती जा रही थी। पत्नी ममता बताती हैं कि शादी को 17 वर्ष हो चुके हैं और उनके दो छोटे बच्चे हैं। जब डॉक्टरों ने बताया कि दोनों किडनियां काम करना बंद कर चुकी हैं और आजीवन डायलिसिस या ट्रांसप्लांट (गुर्दा प्रत्यारोपण) ही विकल्प है, तब सबसे ज्यादा चिंता बच्चों के भविष्य की थी। परिवार के सामने एक ऐसा प्रश्न खड़ा था जिसका उत्तर किसी के पास नहीं था।
इसी दौरान भीलवाड़ा में जीबीएच अमेरिकन हॉस्पिटल में नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अनुराग जैन के विजिट के दौरान युवराज ने उन्हें भी अपनी रिपोर्ट दिखाई। रिपोर्ट देखने के बाद डॉ. जैन ने स्पष्ट रूप से किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी और परिवार को विश्वास दिलाया कि सही समय पर सही निर्णय उनकी जिंदगी बदल सकता है।
भाई ने दी किडनी, पत्नी भी थी तैयार :
पत्नी ममता और भाई दिलीप दोनों की जांचें कराई गईं। जांच में दोनों की किडनी देने में सक्षम पाए गए। बिना एक पल सोचे दिलीप ने अपने भाई को एक किडनी देने का फैसला किया। यह केवल एक अंगदान नहीं था, बल्कि भाई के प्रति प्रेम, त्याग और रिश्ते की सबसे बड़ी मिसाल थी।
6 घंटे चला आॅपरेषन :
जीबीएच जनरल हॉस्पिटल, उदयपुर की किडनी ट्रांसप्लांट टीम ने पूरी तैयारी और अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को अंजाम दिया। करीब 6 घंटे चले आॅपरेषन के बाद जब डाॅक्टर ने आकर सूचना दी कि ऑपरेशन सफल रहा, खुषी का ठिकाना नहीं रहा। दानदाता दिलीप को मात्र चार दिन बाद स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज कर दिया गया, जबकि युवराज की नई किडनी ने सामान्य रूप से कार्य करना शुरू कर दिया। डायलिसिस भी बंद हो गया । आज युवराज पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जी रहे हैं।
मेरा परिवार बच गया – ममता :
उनकी पत्नी ममता भावुक होकर कहती हैं, “जब हमें दोनों किडनी खराब होने का पता चला था, तब हर तरफ डर और निराशा थी। बच्चों का चेहरा देखकर रातों की नींद उड़ जाती थी। लेकिन डॉ. अनुराग जैन और जीबीएच की पूरी टीम ने हमें भरोसा दिया कि सब ठीक होगा। आज मेरे पति स्वस्थ हैं और हमारा परिवार फिर से मुस्कुरा रहा है। इसके लिए हम पूरी टीम के जीवनभर आभारी रहेंगे।”
पहला आॅपरेषन, पूरी तरह सफल :
गुर्दा प्रत्यारोपण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जीबीएच जनरल हॉस्पिटल में हुआ यह पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट केवल एक चिकित्सा उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण है जो गुर्दा रोग से जूझ रहे हैं। ट्रांसप्लांट के लिए सभी नियमों की पालना व कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई। जीबीएच में इस आॅपरेषन में नेफ्रोलाॅजिस्ट डाॅ. मुकेष बडजात्या, डाॅ. अनुराग जैन, डाॅ. महेष देसाई, यूरोलाॅजिस्ट डाॅ. प्रदीप शर्मा, डाॅ. विवेक शर्मा, डाॅ. कमलेष सिंह, डाॅ. वरूण लड्ढा, निष्चेतना विभाग से डाॅ. तरूण भटनागर, डाॅ. राजनेंद्र शर्मा, डाॅ. अपेक्षा कच्छारा, डाॅ. विकास शर्मा व टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह सफलता आधुनिक चिकित्सा, विशेषज्ञ टीम और अंगदान की महान भावना का जीवंत उदाहरण है, जिसने एक परिवार को टूटने से बचाकर उसे फिर से खुशियों से भर दिया।

