उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान में सावन मास के अवसर पर आयोजित शिव कथा के विराम दिवस पर संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने भगवान शिव की भक्ति, तपस्या और लोककल्याण से जुड़े प्रसंगों का मार्मिक वाचन किया। उन्होंने रावण की वर्षों की कठोर तपस्या, भगवान शिव के प्रकट होने और बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना का प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को भक्ति के साथ अहंकार से दूर रहने का संदेश दिया।
अग्रवाल ने कहा कि सच्ची भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भगवान भक्त के सामने प्रकट हो जाते हैं। रावण की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसके नौ कटे सिर पुनः जोड़कर उसे आरोग्य प्रदान किया। रावण ने भगवान शिव से कैलाश को लंका ले जाने का आग्रह किया, तब भगवान ने उसे दिव्य शिवलिंग प्रदान किया। देवताओं को चिंता हुई कि शिवलिंग लंका पहुंचने पर रावण का अभिमान और बढ़ सकता है। उन्होंने ऐसी योजना बनाई कि शिवलिंग पृथ्वी पर स्थापित हो जाए।
कथा के अनुसार, मार्ग में रावण को लघुशंका के लिए जाना पड़ा। उसने एक बालक को शिवलिंग थमा दिया। कुछ समय बाद बालक ने शिवलिंग को पृथ्वी पर रख दिया। लौटकर रावण ने शिवलिंग को उठाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। इसी प्रसंग से बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना की कथा जुड़ी है।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा, “कभी-कभी भगवान हमारी प्रार्थना को अस्वीकार नहीं करते, बल्कि हमारे लिए उससे भी बेहतर योजना बनाते हैं।” उन्होंने कहा कि भगवान शिव केवल शरीर के नहीं, बल्कि आत्मा के वैद्य हैं। शिव की आराधना मनुष्य को भीतर से स्वस्थ, शांत और करुणामय बनाने की प्रेरणा देती है।
कथा के दौरान उन्होंने भीमाशंकर महादेव और भक्त नंदनार के प्रसंग भी सुनाए और भक्ति में समर्पण, समानता तथा विश्वास का महत्व बताया। संगीत और भक्ति से सराबोर कथा में दिव्यांगजन एवं उनके परिवारजनों ने उत्साहपूर्वक नृत्य किया और भगवान शिव के जयकारे लगाए। वातावरण हर-हर महादेव के उद्घोष से गूंज उठा।
कथा के समापन पर अग्रवाल ने विश्व मंगल, शांति और मानव कल्याण की कामना की। उन्होंने उपस्थित जनों को “अपने लिए नहीं, औरों के लिए जीने” का संकल्प दिलाया। साथ ही सेवा, करुणा और परोपकार को शिव भक्ति का वास्तविक स्वरूप बताया।

