चित्तौड़गढ़ (मुकेश मुंदडा)। जिले में इस वर्ष मानसून की बेरुखी ने आमजन से लेकर अन्नदाता तक हर किसी को बेहाल कर दिया है। आधा सावन बीतने को आया है, लेकिन आसमान से राहत की बूंदें बरसने का नाम नहीं ले रही हैं। जिले में इस बार औसत से भी बेहद कम बारिश दर्ज की गई है, जिसके चलते जलस्रोत रीते पड़े हैं और खेतों में दरारें पड़ने लगी हैं। सूखे के इस संकट से उबरने और मेघराज को प्रसन्न करने के लिए अब जिलेभर में टोने-टोटके और धार्मिक अनुष्ठानों का दौर शुरू हो गया है। इसी कड़ी में शहर के प्रसिद्ध और प्राचीन शिवालय हजारेश्वर महादेव मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई। सावन का महीना आधा बीत चुका है, जो अमूमन झमाझम बारिश और हरियाली के लिए जाना जाता है। परंतु इस बार स्थिति इसके ठीक विपरीत है। जिले के अधिकांश छोटे-बड़े बांध और तालाब खाली पड़े हैं, जिससे आने वाले समय में पीने के पानी का संकट भी गहरा सकता है। सबसे ज्यादा मार किसानों पर पड़ रही है। मानसून की इस बेरुखी के चलते फसलों को लेकर किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। बुवाई के बाद बारिश न होने से फसलें मुरझाने की कगार पर हैं। अगर आगामी कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। जब विज्ञान और उम्मीदें जवाब देने लगती हैं, तो आस्था ही एकमात्र सहारा बचती है। इंद्र देव और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शहर के प्राचीन हजारेश्वर महादेव मंदिर में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया। मंदिर महंत चंद्रभारती, श्रवण सामवेदी सहित अन्य पुजारियों के सानिध्य में भगवान भोलेनाथ का सहस्त्रधारा जलाभिषेक किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच महादेव पर अनवरत जल की धारा प्रवाहित की गई। सनातन परंपरा में माना जाता है कि जब भी अकाल या सूखे की स्थिति बनती है, तो भगवान शिव का जलाभिषेक या सहस्त्रधारा करने से आशुतोष प्रसन्न होते हैं और इंद्र देव को अमृत वर्षा करने की आज्ञा देते हैं। सिर्फ हजारेश्वर महादेव ही नहीं, बल्कि जिले के ग्रामीण और शहरी इलाकों में लोग अपने-अपने स्तर पर टोटके और जतन कर रहे हैं। कहीं मंदिरों में अखंड कीर्तन का आयोजन हो रहा है, तो कहीं उज्जैन के महाकाल की तर्ज पर राजा को मनाने के लिए विशेष आरती की जा रही है। फिलहाल, पूरा चित्तौड़गढ़ जिला आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठा है। अब देखना यह है कि आस्था के इन जतनों से इंद्र देव कब पसीजते हैं और चित्तौड़गढ़ की सूखी धरती को कब तृप्त करते हैं।

