डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने कविराव परिवार की हवेली पर मोखाण पधार प्राचीन परम्परा को जीवंत रखा

उदयपुर : मेवाड़ की परंपरा में राजपरिवार और प्रमुख सहयोगी परिवारों के बीच आत्मीय संबंधों तथा सुख-दुःख में सहभागी होने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मेवाड़ के 77वें श्री एकलिंग दीवान श्रीजी हुजूर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़, उदयपुर स्थित बडलिया हवेली पर स्वर्गीय श्री राव बख्तावर सिंह जी के प्रपौत्र राव गजेन्द्र सिंह जी की धर्मपत्नी के देहावसान के पश्चात् हवेली पर मोखाण पधारे। जहां राव गजेन्द्र सिंह जी एवं उनके सुपुत्र राव अक्षय सिंह को अपनी आत्मीय संवेदना व्यक्त की। उन्होंने दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिवार को इस दुःख की घड़ी में धैर्य बंधाया और राव परिवार के सदस्यों को पान बीडा देकर परम्परा को निभाया।
मेवाड़ के इतिहास में राजपरिवार से अपने आत्मीय संबंधों के कारण प्राचीन परम्पराएं अपना विशेष स्थान रखती है। ऐतिहासिक बहियों में इस हवेली पर मेवाड़ के महाराणाओं का मोखाण पधारने का उल्लेख मिलता है। मेवाड़ की 155 वर्ष प्राचीन परम्परा को मेवाड़ के 77वें वंशधर ने जीवंत रख रंग बदलाई दस्तूर में राव नरेन्द्र सिंह को रंग की पाग पहनाई। शास्त्रीजी ने राव गजेन्द्र सिंह, राव महेंद्र सिंह, राव अक्षय सिंह को रंग की पाग पहनाई। श्रीजी हुजूर ने राव परिवार के सदस्यों को सरोपाव प्रदान किए।
ऐतिहासिक संदर्भ:
13 जुलाई 1871 को मेवाड़ के 71वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा शम्भूसिंह जी, कवि राव बक्तावर सिंह की माताजी के देहावसान पर हवेली मोखाण पधारे।
22 अप्रैल 1894 को मेवाड़ के 73वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा फतहसिंह जी, कवि राव बक्तावर सिंह के देहावसान के उपरांत उनके पुत्र गोविन्द सिंह के मोखाण पधारे।
वर्ष 1964 में मेवाड़ के 75वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा भगवतसिंह मेवाड़ ने कवि राव बक्तावर सिंह के सुपौत्र कवि राव मोहन सिंह के देहावसान पर मोखाण पधारकर अपनी आत्मीयता प्रकट की थी।
वर्ष 2026 में श्रीजी हुजूर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का कवि राव परिवार की हवेली पर मोखाण पधारना इसी ऐतिहासिक एवं आत्मीय परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। यह केवल एक शोक-सांत्वना का अवसर नहीं, बल्कि मेवाड़ की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है जिसमें राजपरिवार अपने आत्मीय संबंधों के सुख-दुःख में सदैव सहभागी रहा है।