त्याग स्वयं पर करे, राग-द्वेष, ईर्ष्या और निंदा से ऊपर उठे: कैलाश मानव

उदयपुर । नारायण सेवा संस्थान के सेवा महातीर्थ बड़ी परिसर में आयोजित “अपनो से अपनी बात भोले नाथ के साथ” शिव कथा में भक्ति और अध्यात्म का भावपूर्ण संगम हुआ। व्यास पीठ से संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने सृष्टि के प्रथम पुरुष मनु और मां स्वरूपा स्त्री शतरूपा के तप, सृष्टि विस्तार तथा दक्ष एवं माता जगदम्बा से जुड़े प्रसंगों का मार्मिक वर्णन किया। कथा के आध्यात्मिक प्रसंगों ने देशभर से आए दिव्यांगजनों और उनके परिजनों को भाव-विभोर कर दिया।
कथा के दौरान संस्थान संस्थापक चेयरमैन कैलाश मानव भी पहुंचे। उन्होंने विधिवत शिव पूजन कर भगवान भोलेनाथ के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की और उपस्थित श्रद्धालुओं का अभिनंदन किया। उन्होंने नारायण सेवा संस्थान की सेवा यात्रा में पिंडवाड़ा की पीड़ा से लेकर आज तक सहयोग देने वाले दानदाताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भोलेनाथ बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि मन की सच्चाई और छोटी-सी सेवा भावना से भी प्रसन्न हो जाते हैं। सेवा में समर्पित भाव ही सच्ची शिव आराधना है।
कैलाश मानव ने कहा कि मनुष्य को जीवन में त्याग दूसरों से नहीं, सबसे पहले स्वयं से करना चाहिए। राग, द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार और निंदा जैसी प्रवृत्तियों का त्याग कर मन को निर्मल बनाना ही आध्यात्मिक साधना का सार है। उन्होंने कहा कि हम यदि किसी के दुख को अपना समझकर उसके जीवन में राहत ला सकें तो इससे बड़ी पूजा कोई नहीं। जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाना ही भगवान की सच्ची सेवा है।
प्रशांत अग्रवाल ने कथा प्रसंगों के माध्यम से बताया कि भगवान शिव सहजता, करुणा और समभाव के प्रतीक हैं। शिव कथा हमें सिखाती है कि विषम परिस्थितियों में भी धैर्य, त्याग और परोपकार का भाव नहीं छोड़ना चाहिए। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने शिव भजनों के साथ भक्ति भाव से सहभागिता की। परिसर में हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण शिवमय हो उठा।
अग्रवाल ने आहवान किया कि पूजा केवल मंदिर तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार और कर्मों में भी दिखाई दे। मन में करुणा, वाणी में मधुरता और कर्म में सेवा हो तो जीवन स्वयं शिवमय बन जाता है।