नई तकनीकों से बदल रहे सोशल नेटवर्क, गोपनीयता और सुरक्षा पर ध्यान जरूरी : प्रो शाश्वती गंगोपाध्याय

कम्युनिकेशन टुडे’ के 239वें राष्ट्रीय वेबिनार में उभरती तकनीकों के अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा

जयपुर। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य उभरती तकनीकें सोशल नेटवर्क को संवाद के साधनों से आगे बढ़ाकर शिक्षा, व्यापार, मनोरंजन और सामाजिक सहभागिता के व्यापक मंचों में बदल रही हैं। इस परिवर्तन का लाभ उठाने के लिए तकनीकी नवाचार के साथ डेटा की गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और जिम्मेदार उपयोग पर ध्यान देना आवश्यक है। यह विचार बर्दवान विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग की प्रोफेसर डॉ. शाश्वती गंगोपाध्याय ने ‘Emerging Technologies and Social Networks’ विषय पर आयोजित 239वें राष्ट्रीय वेबिनार में अपनी प्रस्तुति के दौरान रखे।

जयपुर से प्रकाशित मीडिया शोध त्रैमासिक ‘कम्युनिकेशन टुडे’ तथा भारती विद्यापीठ इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशंस एंड मैनेजमेंट, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबिनार में सोशल नेटवर्क में नई तकनीकों के समावेश और उनके प्रभावों पर चर्चा हुई।

प्रो. गंगोपाध्याय ने बताया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सोशल मीडिया की कार्यप्रणाली को अनेक स्तरों पर प्रभावित कर रही है। उपयोगकर्ताओं की रुचियों और व्यवहार का विश्लेषण, उपयुक्त सामग्री की अनुशंसा, विज्ञापनों का चयन, सामग्री निर्माण तथा पोस्ट प्रकाशित करने का समय निर्धारित करने में इसका उपयोग हो रहा है। चैटबॉट त्वरित सहायता प्रदान करते हैं, जबकि सोशल लिसनिंग के माध्यम से संस्थाएँ अपने बारे में होने वाली चर्चाओं और जनभावनाओं को समझ सकती हैं।

उन्होंने ऑगमेंटेड रियलिटी के उपयोग को समझाते हुए बताया कि चेहरे पर डिजिटल फिल्टर लगाने और खरीदारी से पहले उत्पादों को आभासी रूप से आजमाने जैसी सुविधाएँ उपयोगकर्ताओं की सहभागिता बढ़ाती हैं। इससे डिजिटल विपणन और उपभोक्ताओं से संवाद के नए अवसर विकसित हो रहे हैं।

प्रस्तुति में सोशल नेटवर्क से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक भुगतान सुविधाओं और बायोमेट्रिक पहचान की भूमिका भी रेखांकित की गई। भुगतान सुविधाएँ डिजिटल व्यापार को सुगम बनाती हैं, जबकि फिंगरप्रिंट और चेहरे की पहचान जैसी तकनीकें सुरक्षित पहुँच में सहायता करती हैं। मेटावर्स के संदर्भ में आभासी बैठकों, सांस्कृतिक आयोजनों, शिक्षा और सामाजिक संपर्क की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया।

प्रो. गंगोपाध्याय ने गेमिफिकेशन का उल्लेख करते हुए बताया कि अंक, बैज और अन्य प्रोत्साहनों के माध्यम से उपयोगकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने नई तकनीकों के तेजी से बदलते स्वरूप और उनके प्रभावों से जुड़ी अनिश्चितताओं को समझने की आवश्यकता भी बताई।

‘कम्युनिकेशन टुडे’ के संपादक तथा राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार केंद्र के पूर्व अध्यक्ष प्रो. संजीव भानावत ने कहा, “तकनीक की प्रगति तभी सार्थक है, जब वह मानव जीवन को बेहतर बनाए और समाज में विश्वास बढ़ाए। सोशल नेटवर्क की शक्ति का उपयोग ज्ञान, संवाद और जनहित के लिए होना चाहिए। मीडिया शिक्षकों और विद्यार्थियों को तकनीकी दक्षता के साथ नैतिक विवेक भी विकसित करना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सुविधाएँ अपनाते समय तथ्य सत्यापन, गोपनीयता और मानवीय संवेदनाओं की रक्षा जरूरी है। हमारा लक्ष्य तकनीक के माध्यम से जिम्मेदार संचार संस्कृति विकसित करना हो।”

चर्चा में पटौदा, झज्जर, हरियाणा से डॉ. दयानंद कादियान तथा मेरठ से डॉ. सूरज देव प्रसाद ने भाग लिया। इस दौरान तकनीकी सुविधाओं के विस्तार के साथ भ्रामक कृत्रिम सामग्री, निजी जानकारी के दुरुपयोग, साइबर खतरों और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को गंभीरता से लेने की आवश्यकता रेखांकित की गई। सुरक्षित और उपयोगी डिजिटल समुदायों के निर्माण के लिए नवाचार तथा जिम्मेदार तकनीकी शासन के बीच संतुलन आवश्यक बताया गया।

वेबिनार संयोजक एवं भारती विद्यापीठ की सहायक प्रोफेसर प्रियंका सिंह ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की तथा धन्यवाद ज्ञापित किया। मुख्य वक्ता का ई-बुके एवं ई-स्मृति-चिह्न से अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम के सफल संचालन में भारती विद्यापीठ के जयंत राठी, पुष्पेंद्र सिंह, अंबुश तथा डॉ. पृथ्वी सेंगर (आईआईएमटी विश्वविद्यालय, मेरठ) का महत्वपूर्ण योगदान रहा।