– प्रो. संजीव भानावत
अभी दो-तीन दिन पहले ही तो उनसे देर तक बात हुई थी। मैंने स्वास्थ्य का हाल पूछा तो उन्होंने सहज भाव से कहा था, “मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ। न कोई ब्लड प्रेशर है, न कोई दूसरी बीमारी। किसी प्रकार की दवा भी नहीं लेता हूँ।” उनकी यह बात सुनकर मन को संतोष हुआ था। उस समय कहाँ पता था कि यह हमारी अंतिम लंबी बातचीत होगी। आज उनके जाने का समाचार सुनकर वही शब्द बार-बार याद आ रहे हैं। मन उस बातचीत को फिर से सुनना चाहता है, शायद इस उम्मीद में कि उसके आगे भी कोई बातचीत बाकी हो।
मैं इन दिनों मुंबई में रहता हूँ। उसी बातचीत में मैंने उनसे कहा था, “इस दीपावली पर मुंबई से जयपुर आ रहा हूँ। तब आपसे मिलूँगा।” मन में उनसे फिर मिलने और देर तक बातचीत करने की सहज इच्छा थी। लेकिन अब जयपुर जाने पर वह मुलाकात नहीं हो सकेगी। इस बार जयपुर में उनके न होने का अहसास उन स्मृतियों को और गहरा कर देगा, जो उनके साथ जुड़ी हैं। मिलने की वह बात अब एक अधूरी इच्छा बनकर रह गई है। उनकी आयु लगभग 84 वर्ष थी।
7 अक्टूबर 2026 की रात प्रोफेसर रमेश जैन के अचानक निधन की खबर मिली। बताया गया कि लो ब्लड प्रेशर के कारण उनका निधन हुआ। कुछ दिन पहले स्वयं को पूरी तरह स्वस्थ बताने वाले अपने पुराने साथी के बारे में यह समाचार स्वीकार करना कठिन है। उनके साथ बिताए वर्षों की यादें लौट रही हैं। यह सोचकर मन उदास हो जाता है कि अब उनका हाल पूछने के लिए फोन करूँगा तो दूसरी ओर उनकी परिचित आवाज नहीं होगी।
रमेश जी से मेरा संबंध चार दशक से अधिक पुराना था। वर्ष 1981 में उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय के पत्राचार अध्ययन संस्थान में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्य ग्रहण किया था। जनवरी 1982 में मैं भी उसी संस्थान में सहायक प्रोफेसर के रूप में उनके साथ काम करने लगा। हमारे अकादमिक जीवन के वे शुरुआती वर्ष थे। साथ काम करते हुए जो परिचय बना, वह समय के साथ एक आत्मीय संबंध में बदलता गया। आज उस समय को याद करते हुए रमेश जी का सहज व्यक्तित्व बहुत निकट महसूस होता है।
उन्होंने राजस्थान में पत्राचार के माध्यम से पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को व्यवस्थित और बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। पत्राचार शिक्षा में पाठ्य सामग्री का विशेष महत्व होता है। नियमित कक्षा से दूर रहने वाले विद्यार्थी को ऐसी सामग्री चाहिए, जो विषय समझने में उसकी सहायता करे और आगे पढ़ने का विश्वास भी दे। पत्रकारिता जैसे विषय को इस माध्यम से प्रभावी ढंग से पढ़ाना अपने आप में चुनौती थी। रमेश जी ने इस कार्य को गंभीरता से लिया और उसे बेहतर बनाने में अपनी कल्पनाशीलता तथा परिश्रम लगाया।
1987 में कोटा खुला विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद, 1987-88 के दौर में उन्होंने वहाँ जाने का विकल्प प्रस्तुत किया और कार्यभार ग्रहण किया। यही संस्था आज वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के नाम से जानी जाती है। वहाँ उनकी अकादमिक यात्रा आगे बढ़ी और कालांतर में वे प्रोफेसर के पद तक पहुँचे। मुक्त विश्वविद्यालय की अवधारणा के अनुरूप पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को क्रियान्वित करने में उनकी प्रयोगधर्मिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा। राजस्थान में दूरस्थ पत्रकारिता शिक्षा के विकास को याद करते समय उनके इन प्रयत्नों को सम्मानपूर्वक याद किया जाएगा।
मैंने खुला विश्वविद्यालय जाने का विकल्प नहीं दिया और राजस्थान विश्वविद्यालय में ही रहा। आगे चलकर मैं पत्रकारिता के नियमित शिक्षण से जुड़ा। कार्यस्थल अलग हो जाने के बाद भी रमेश जी से संवाद बना रहा। जब भी बात होती, एक पुराने सहकर्मी से मिलने का अपनापन महसूस होता। वर्षों पहले साथ काम करने से बना वह विश्वास हमारी बातचीत में बना रहा। हाल की लंबी बातचीत भी उसी संबंध की एक कड़ी थी, जिसके अचानक टूट जाने का दुख आज बहुत गहरा है।
उनका सरल और सहज स्वभाव हमेशा याद रहेगा। उनसे बातचीत में किसी औपचारिकता का बोझ महसूस नहीं होता था। जब कभी उनके निवास पर जाना हुआ, वे बड़े आतिथ्य भाव से मिले। परिवार के सभी लोगों की कुशलक्षेम पूछना उनके व्यवहार का स्वाभाविक हिस्सा था। किसी के घर जाकर यह महसूस होना कि आपकी उपस्थिति से उसे प्रसन्नता हुई है, संबंध को और गहरा बनाता है। रमेश जी के यहाँ मिलने वाला वह अपनापन मेरे लिए एक सुखद स्मृति रहेगा।
सोशल मीडिया पर वे सक्रिय नहीं थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अपना समय पुस्तक लेखन में लगाया। पत्रकारिता की विभिन्न विधाओं पर उनकी अनेक पुस्तकें उनके निरंतर अकादमिक श्रम का परिचय देती हैं। जिस विषय को उन्होंने वर्षों तक पढ़ाया और जिसके पाठ्यक्रम को विकसित करने में योगदान दिया, उसी विषय के लिए उनका लेखन चलता रहा। उनकी पुस्तकों में संचित अनुभव विद्यार्थियों और शिक्षकों के काम आता रहेगा। उनके जाने के बाद इन पुस्तकों को पढ़ना उनके विचारों से फिर मिलने जैसा होगा।
रमेश जी को याद करते हुए उनके अध्यापन, पाठ्यक्रम विकास और लेखन के साथ उनका आत्मीय व्यवहार भी उतनी ही स्पष्टता से सामने आता है। किसी सहकर्मी के साथ लंबा संबंध अनेक छोटी-छोटी बातों से बनता है। कभी स्वास्थ्य पूछ लेना, कभी परिवार का हाल जानना और कभी देर तक बातचीत करना। उस समय ये सब जीवन का सामान्य हिस्सा लगते हैं। किसी के चले जाने पर इन्हीं बातों का मूल्य और अधिक समझ में आता है। आज हमारी अंतिम बातचीत मेरे लिए ऐसी ही अनमोल स्मृति बन गई है।
मन में एक कसक बनी हुई है कि काश, उनसे एक बार और बात हो पाती। स्वास्थ्य का वही प्रश्न पूछ पाता और वे उसी सहजता से अपना हाल बताते। अब उनके साथ हुआ संवाद स्मृतियों में सँभालना होगा। उनके परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदना है। उनके निधन से पत्रकारिता शिक्षा ने एक समर्पित शिक्षक और लेखक को खोया है, और मैंने एक ऐसे पुराने साथी को, जिनसे वर्षों का आत्मीय संबंध था। रमेश जी, आपके साथ काम करने के दिन, आपकी सहज बातचीत और आपके घर का आतिथ्य हमेशा याद रहेगा। पत्रकारिता शिक्षा में आपका योगदान सम्मान के साथ स्मरण किया जाएगा। अभी तो आपसे देर तक बात हुई थी। उस बातचीत की स्मृति मन में सँभाले हुए आपको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
प्रोफेसर रमेश जैन से फिर मिलने और बातचीत करने की इच्छा अधूरी रह गई
