उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान के सेवातीर्थ स्थित वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा एवं ‘अपनों से अपनी बात’ में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने माँ कालरात्रि की महिमा और माँ सरस्वती के ज्ञान एवं वाणी से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से सेवा, समर्पण, विनम्रता और दिव्यांगजनों के प्रति सम्मान का संदेश दिया।
कथा में देवराज इंद्र और देवगुरु बृहस्पति के प्रसंग में बताया कि अहंकार के कारण व्यक्ति अपने गुरु और बड़ों का सम्मान करना भूल जाता है। बृहस्पति के अपमान के बाद देवताओं को अनेक संकटों का सामना करना पड़ा। वहीं, महर्षि दधीचि के त्याग की कथा ने परोपकार और जनकल्याण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने की प्रेरणा दी। वृत्रासुर की कथा में उन्होंने कहा परिस्थितियां कैसी भी हों, व्यक्ति अपने आचरण और विचारों से श्रेष्ठ मार्ग चुन सकता है।
इसके बाद उन्होंने ने महर्षि याज्ञवल्क्य की ज्ञान साधना का वर्णन किया। गुरु वैशम्पायन की आज्ञा पर विद्या लौटाने के बाद याज्ञवल्क्य ने माँ सरस्वती की आराधना की और पुनः ज्ञान प्राप्त किया। महर्षि याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी के संवाद के माध्यम से धन की अपेक्षा आत्मज्ञान और विवेक के महत्व को भी बताया गया।
कथा के दौरान वाणी की शुद्धता और संवेदनशील भाषा के प्रयोग पर विशेष जोर दिया गया। बताया गया कि किसी व्यक्ति के लिए अपमानजनक या दया दर्शाने वाले शब्दों के बजाय सम्मानजनक संबोधन अपनाना चाहिए। दिव्यांगजनों को ‘बेचारा’ कहने के स्थान पर उन्हें समानता और आत्मीयता के साथ संबोधित करना समाज की जिम्मेदारी है। माँ सरस्वती की सच्ची आराधना तभी सार्थक है, जब हमारी वाणी दूसरों को सम्मान और आत्मविश्वास प्रदान करे।
