उदयपुर। दीपावली केवल धन-संपत्ति अर्जित करने का नहीं, बल्कि धर्म, सदाचार, विवेक और सेवा को जीवन में अपनाने का पर्व है। धन की सार्थकता तभी है, जब उससे स्वयं के साथ दूसरों के जीवन में भी खुशियां आएं। यह विचार नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने सेवातीर्थ स्थित वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में आयोजित ‘अपनों से अपनी बात’ कार्यक्रम में कही।

उन्होंने दीपावली से जुड़े धार्मिक प्रसंगों के माध्यम से जीवन के नैतिक और व्यावहारिक संदेश समझाए। इनमें प्रह्लाद और इंद्र की कथा, लक्ष्मी-गणेश प्रसंग, समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध एवं 16 हजार कन्याओं को मुक्त कर सम्मान देने तथा यम दीपदान की कथा शामिल रही।
प्रह्लाद और इंद्र के प्रसंग से उन्होंने बताया कि शील, धर्म, सत्य और सदाचार ही स्थायी समृद्धि के आधार हैं। प्रह्लाद से शील प्राप्त करते ही इंद्र के साथ धर्म, सत्य, सदाचार और बल भी चले गए तथा अंततः लक्ष्मी ने भी उनका साथ छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि धन से बड़ा चरित्र है, क्योंकि समृद्धि का स्थायी आधार नैतिकता और सदाचार हैं।
लक्ष्मी-गणेश प्रसंग के माध्यम से उन्होंने धन के साथ बुद्धि और विवेक की आवश्यकता बताई। गणेश बुद्धि के प्रतीक हैं, इसलिए लक्ष्मी पूजन से पहले उनका पूजन किया जाता है। धन कमाना ही पर्याप्त नहीं, उसका सही उपयोग करना भी जरूरी है। भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने निरोगी काया को जीवन का सबसे बड़ा सुख बताया। वहीं, श्री कृष्ण और नरकासुर की कथा से नारी सम्मान तथा यम दीपदान से परिवार के प्रति प्रेम और समर्पण का संदेश दिया।
अग्रवाल ने कहा कि दीपावली की सार्थकता तभी है, जब घरों में दीप जलने के साथ किसी जरूरतमंद के जीवन में भी खुशियों का उजाला पहुंचे। दिव्यांगजनों को उपचार, कृत्रिम अंग, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के अवसर देना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने सभी से दीपावली पर जरूरतमंदों की सहायता का आह्वान किया।
