शतखण्ड पृथ्वी का सर्वोत्तम स्थान मेदपाट यानि मेवाड़- जगद्गुरु श्री वसन्त विजयानन्द गिरी जी महाराज

पहले दिन राजा एकलिंगजी शिव पुराण कथा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
एकलिंगजी और मेवाड़ की उत्पत्ति की कथा सुन भाव विव्हल हुए श्रद्धालू
उदयपुर (डॉ. तुक्तक भानावत)।
शतखण्ड पृथ्वी पर सर्वोत्तम स्थान कोई है तो वह मेदपाट यानि मेवाड़ है। जब पृथ्वी दैत्यों के मेद से मैली हो गई, उसका एक भाग जो सबसे पवित्र रहा, वह मेदपाट यानि मेवाड़ कहलाया। इसी मेदपाट पर जग पूज्य एकलिंगजी का प्राकट्य हुआ। एकलिंगजी की महिमा अनंत है। यह प्रसंग अनन्त विभूषित कृष्णगिरी तीर्थ पीठाधीश्वर पूज्यपाद जगद्गुरु श्री वसंत विजयानंद गिरीजी महाराज ने श्री महालक्ष्मी कोटि कुंकुमार्चन यज्ञ पूजा महोत्सव के प्रथम दिवस की संध्या राजा एकलिंगजी, शिव महापुराण कथा में बताया। सम्भवतः पहली बार मेवाड़ की पौराणिक उत्पत्ति के बारे में श्रद्धालुओं ने इस कथा के माध्यम से जाना।


गुरुदेव ने एकलिंगनाथजी की कथा सुनाते कहा कि जब भगवान विष्णु शयनरत थे तब उनके कान के मैल से दो दैत्य मधु और केतक उत्पन्न हुए। जब उन्होंने पृथ्वी पर तांडव मचाया तो दुखी होकर सभी देवगण, भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। प्रभु से आग्रह किया कि दैत्यों का अंत आप ही कर सकते हैं। भगवान विष्णु ने दुर्लभ अस्त्र, शस्त्र का उपयोग किया लेकिन दैत्य पुनः जीवित हो उठते। तब भगवान से देवों ने कहा कि मायापति इन दैत्यों को माया से ही मार सकते हैं। भगवान विष्णु ने दैत्यों की खूब प्रशंसा की। गुरुदेव ने कहा कि किसी को ऊंचा चढ़ाओगे तो वह नीचे ही आएगा। भगवान ने इसी दृष्टि से दैत्यों की प्रशंसा की। प्रसन्न होकर दैत्यों ने भगवान को इच्छा वरदान मांगने को कहा। भगवान विष्णु ने अवसर मिलते ही दैत्यों से वरदान मांगा कि तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओगे। भगवान विष्णु को मिला वरदान फलित हुआ। दोनों राक्षस मारे गए। घरती पर उनका मेद गिरा तब से धरती मेदिनी कहलाई। प्रतु राजा ने मेद साफ कर पृथ्वी को पवित्र किया गया। इसका स्वच्छ भाग जिसके चारों और पृकृति की सुरम्यता, नदियां, पर्वत आदि सतयुग से ही यहां अवस्थित हैं। पवित्रता के कारण इसे मेदपाट कहा गया यही अब मेवाड़ है।


जगद्गुरु पूज्यपाद श्री वसंत विजयानन्द गिरीजी महाराज ने कथा में कहा कि धरती को स्वच्छ पवित्र करने पर राजा प्रतु को वरदान मांगने को कहा। राजा प्रतु ने कहा तुम मेरे नाम से जानी जाओ, तब से धरती को पृथ्वी नाम से जाना गया।
जगद्गुरु देव ने प्रसंग बताया कि मां पार्वती ने एक बार देवताओं को छल से मोहित करने की जिद भगवान शिव से की। प्रभु, पार्वती की इच्छा नकार न सके और सुंदर स्त्री का रूप धरकर देवों को मोहित कर दिया लेकिन जब यह रहस्य खुला तो देवगण कुपित हो गये। उन्होंने भगवान शिव का लिंग विच्छेद होने का श्राप दे दिया। प्रभु विचलित हो गए। तब मां पार्वती ने उन्हें वर दिया कि यही श्राप ही वरदान का रूप होगा। एकलिंगजी के नाम से जगत में पूजे जाओगे। तब आत्मज्योति लिंग के रूप में अमरकंटक में प्रकट होकर पूण्य सलिला नर्मदा का स्पर्श हुआ और नर्मदा मैया से होते हुए पाताल लोक में दिव्य ज्योति पाताल में गिरी। तब कामधेनु ने पाताल से लाकर एकलिंगजी को स्थापित किया। मां पार्वती ने साथ ही शिवजी को श्राप देने वाले देवताओं को भी श्राप दिया था कि एकलिंगजी के आसपास पाषाण स्वरूप में रहोगे। तब से एकलिंगजी के चारों और वे देव पाषण रूप में उद्धरित किये जाते हैं।  एकलिंगनाथजी को मेवाड़ के रक्षक कहे जाते हैं । दैवीय वरदान में कहा गया, एकलिंगनाथ के पश्चिम की ओर कुटिला नदी बहेगी। पौराणिक काल की जया बनास हुई और विजया गंभीरी। वर्णनाशा यानि बनास। यह नदियां आज भी मेवाड़ को हरा भरा और पृकृति के आशीर्वाद से पल्लवित करती हैं। एकलिंगजी की महिमा अपरंपार है। जगद्गुरू श्री वसन्त विजयानन्द गिरीजी ने कथा के मध्य श्रद्धालुओं को कई चमत्कारी अनुभव भी साक्षात करवाये। कथा में सुमधुर भजनों पर भक्तगण खुद को झूमने, थिरकने से रोक न पाए।
विधायक श्री कलरू बोले- नई पीढ़ी को सनातन से जोड़ने का अद्भुत महोत्सव :


महोत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष नानालाल बया, महामंत्री देवेन्द्र मेहता ने बताया कि सोमवार को मेड़ता सिटी विधायक लक्ष्मणराम कलरू ने कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु पूज्यपाद वसन्त विजयानन्द गिरीजी महाराज का मंगल आशीर्वाद लिया। गुरुदेव से श्री कलरू ने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की।  
इस अवसर पर विधायक लक्ष्मणराव कलरू ने कहा कि नई पीढ़ी को सनातन संस्कृति से जोड़ने वाला यह पवित्र महोत्सव अद्भुत है। सरकार भी विरासत और संस्कृति पर जोर दे रही है, ऐसे में जगद्गुरु पूजनीय श्री वसन्त विजयानन्द गिरीजी द्वारा उदयपुर की धरती पर किया जा रहा यह महा महोत्सव अनुकरणीय। नई पीढ़ी को गुरुदेव की सीख नई दिशा देगी। 

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