उदयपुर। राजस्थान साहित्य आकदमी, उदयपुर एवं महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउण्डेशन, सिटी पैलेस, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘मेवाड़ राज्यवंश एवं साहित्य’’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन सिटी पैलेस के कॉन्फ्रेन्स हॉल में किया गया। संगोष्ठी का मुख्य केन्द्र मेवाड़ राजवंश की वह परम्परा रही, जिसने साहित्य के संरक्षण और उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने मेवाड़ के शासकों की साहित्यिक परम्परा, सांस्कृतिक दृष्टि और ज्ञान-संरक्षण में उनकी भूमिका पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के शुभारम्भ में, राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. बसन्त सिंह सोलंकी ने संगोष्ठी का परिचय देते हुए बताया कि मेवाड़ वीरों की भूमि रही है, लेकिन साहित्य में उसके योगदान को भी समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन से मेवाड़ की साहित्यिक परम्परा को नये दृष्टिकोण से देखने का अवसर मिलता है।
डॉ. विद्या पालीवाल-वरिष्ठ साहित्यकार ने अपने सम्बोधन में उन्होंने मेवाड़ को ‘‘राजपूती गौरव की अद्भुत भूमि’’ बताते हुए इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित किया। लगभग 80 के दशक में किये गये अपने शोध कार्य के लिए डॉ. पालीवाल ने मेवाड़ राजपरिवार के प्रति आभार व्यक्त किया।
हिन्दी विभाग पूर्व विभागाध्यक्ष, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्रो. माधव हाड़ा ने कहा कि भारतीय साहित्य और इतिहास को समझने के लिए अपनी बौद्धिक परम्परा के आधार पर दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने आधुनिकता के प्रभाव और भारतीय चिन्तन पर पड़े यूरोपीय प्रभाव का उल्लेख किया। इतिहासकार डॉ. जे.के. ओझा ने बताया कि मराठा काल के दौरान मेवाड़ में राजनीतिक अस्थिरता और मराठों के बढ़ते प्रभाव के बावजूद साहित्य सृजन की समृद्ध परम्परा जारी रही। इस दौर में शासकों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद कला और साहित्य को संरक्षण दिया, जिसके परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई। डॉ. राजेन्द्रनाथ पुरोहित, पूर्व प्रभारी अधिकारी राजस्थान ओरिएन्टल संस्थान उदयपुर ने बताया कि उदयपुर शाखा की स्थापना में महाराणाओं के निजी पुस्तकालय में संग्रहित पाण्डुलिपियों का विशेष योगदान रहा। इस संग्रह को विभिन्न महाराणाओं के समय में ‘‘सरस्वती भंडार’’, ‘‘सज्जन वाणी विलास’’ के नाम से जाना गया। मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय इतिहास विभाग के सहायक आचार्य डॉ. मनीष श्रीमाली ने महाराणा सज्जन सिंह के शासनकाल में प्रकाशित सज्जन कीर्ति सुधाकर मेवाड़ गजट का उल्लेख करते हुए करते हुए हिन्दी पत्रकारिता के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने बताया कि सर्वप्रथम मेवाड़ में 1868 में उदयपुर गजट का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसे बाद में महाराणा सज्जनसिंह के संरक्षण में 1878 में सज्जन कीर्ति सुधाकर नाम दिया गया। यह मुख्यतः हिन्दी भाषा का समाचार पत्र था। जिसमें सरकार के महत्वपूर्ण आदेशों के साथ-साथ मेवाड़ की आम जनता को शिक्षित करने के दायित्व का निर्वाह किया गया। संगोष्ठी का संचालन डॉ. सरस्वती जोशी द्वारा किया गया।
संगोष्ठी के अंत में महाराणा मेवाड़ अनुसंधान केन्द्र की शोध अधिकारी डॉ. स्वाति जैन ने सभी का धन्यवाद करते हुए फाउण्डेशन की ओर से उपहार स्वरुप मेवाड़ की पुस्तकें आदि भेंट की।
उदयपुर सिटी पैलेस में ‘‘मेवाड़ राजवंश एवं साहित्य’’ विषय पर संगोष्ठी
