“पुण्यभूमि नागदा, नागदा विप्रकुल और परमेष्टी राज्य मेवाड़ पर उम्दा पुस्तक

मेवाड़ राज्य देश का एक मात्र परमेष्ठी राज्य रहा है व इसकी प्रथम राजधानी उदयपुर के पास स्थित नागदा में रही है। इसलिए इस राज्य के अधिष्ठाता सदैव एकलिङ्ग जी व सभी राजा एकलिङ्गनाथ के दीवान मानो जाते रहे हैं। मेवाड़ राज्य के आद्य शासक बाप्पा रावल का पालन इसी तत्कालीन भव्य नागदा नगर में नागदा विप्र-कुलों ने किया था। इस राज्य की स्थापना नागदा विप्रकुलों ने विशिष्ट रणनीतिक उद्देश्यों से परमेष्ठी राज्य के रूप में स्थापित की थी। इस पुस्तक में आठवीं सदी में मेवाड़ राज्य की स्थापना के अतिरिक्त बाप्पा रावल के पालनकर्त्ता नागदा विप्रकुलों के त्रेतायुग से वर्तमान युग तक के तीनों युगों के सन्दर्भ भी है।
लेखक प्रोफ़ेसर भगवती प्रकाश शर्मा की पुस्तक “पुण्यभूमि नागदा, नागदा विप्रकुल और परमेष्टी राज्य मेवाड़” में मेवाड़ के आद्य शासक बाप्पा रावल के पालनकर्त्ता इन नागदा विप्र-कुलों के तीन युगों (त्रेता, द्वापर व वर्तमान कलियुग) के सुदीर्घ सन्दर्भों की चर्चा की गई है।
द्वापर युग के अन्त में इन्हीं नागदा विप्र-कुलों ने 5,039 वर्ष पूर्व अभिमन्यु के पौत्र राजा जनमेजय के लिए नागदाह यज्ञ सम्पन्न किया था। इस नागदाह यज्ञ अर्थात सर्पसत्र का महाभारत में भी 6 अध्यायों में वर्णन है। इस नागदाह यज्ञ को युधिष्ठिर सम्वत 88 (3014 ईसापूर्व) में किया ऐसे अभिलेखीय सन्दर्भ भी पुस्तक में दिये हैं। ऐसी भी जनश्रुति है कि, मेवाड़ के मेनारिया पालीवाल, पानेरी, त्रिवेदी-मेवाड़ा सहित मेवाड़ के कई विप्रकुलों के पूर्वजों ने इस नागदाह यज्ञ में सहभाग किया था।
आठवीं सदी में मेवाड़ राजवंश के आद्य शासक बाप्पा रावल के कुल के युद्ध में वीरगति पाने पर उनकी माता ने नागदा विप्रकुलों के गृह-स्थान नागह्रद तीर्थ (वर्तमान नागदा गाँव) में सुरक्षित आश्रय ग्रहण किया था। बाप्पा रावल का जन्म वहीं उदयपुर से 18 किलोमीटर दूर इस नागदा में हुआ था, जहाँ तब राजा जनमेजय का बसाया भव्य नगर था। वहीं नागदा विप्रकुलों ने बाप्पा का पालन किया था और मेवाड़ के इस परमेष्ठी राज्य की स्थापना कर, बाप्पा रावल का एकलिङ्गनाथ के दीवान के रूप में इस नवस्थापित मेवाड़ के आद्य शासक के रूप में राज्यारोहण किया था।
एकलिङ्ग महात्म्य के अनुसार माता पार्वती के आदेश से शिवगण नन्दी राज वाष्प के रूप में अवतरित हुए थे। मेवाड़ राज्य ने 1200 वर्षों तक अरब व तुर्क आक्रान्ताओं से लेकर मुगलों तक सभी से घोर संघर्ष कर स्वाधीनता पर्यन्त देश,समाज, धर्म व संस्कृति की रक्षा की है। पुस्तक के परिशिष्टों में यथा-सुलभ पाण्डुलिपीय व शिलालेखीय सन्दर्भ भी दिये गए हैं।
पुस्तक के परिशिष्ट में ऊपर उद्धृत नागदा विप्रकुल के एक ग्राम बूझड़ा के एक गोत्र की 109 पीढ़ियों की अविच्छिन्न वंशावली भी है। इस वंशावली में नवीं सदी से वर्ष 1941 तक की इस गोत्र की 62 पीढ़ियों का वंशवृक्ष भी, मेवाड़ राज्य-शासन द्वारा प्रमाणित, मुद्रांकित, राजस्व मुद्रांक युक्त भी प्रस्तुत किया है, जो तत्कालीन 1941 के सह-उपजिलाधीश द्वारा हस्ताक्षरित भी है। इस वंशवृक्ष की एक पीढ़ी का काल 25 वर्ष मान लेने पर 109 पीढ़ियों की कालावधि 2600 वर्ष पीछे ले जाती है। बाप्पा रावल से अब तक मेवाड़ के शासकों की भी 77 पीढ़ियां निकलीं हैं। यह भी एक कीर्तिमान है। उक्त सजरे में राज्य द्वारा प्रमाणित 62 पीढ़ियों की परवर्ती 3 पीढ़ियां वर्तमान में विद्यमान हैं इन प्रमाणित 65 पीढ़ियों की पूर्ववर्ती 44 पीढ़ियों के नाम नागदा विप्रकुल के बड़वाओं में सर्वश्री माँग सिंह जी की वंशावली की पाण्डुलिपि से संकलित किए गए हैं। इस प्रकार पुस्तक के परिशिष्ट की इस वंशावली में 109 पीढ़ियों के नाम संकलित हैं। यह भी एक अद्वितीय अभिलेख है।
पुस्तक में इन्हीं नागदा विप्रकुलों के पूर्वजों को भगवान श्रीराम द्वारा त्रेतायुग में 52,000 बीघा भूमि उपहार में दिये जाने के सन्दर्भों के भी उद्धरण हैं। इस प्रकार पुस्तक में नागदा विप्रकुल के त्रियुगीन सन्दर्भ भी उद्धृत हैं।

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