लाल वेश, स्वर्णाभूषण और भक्ति की चमक: महालक्ष्मी के प्राकट्योत्सव में सजी आध्यात्मिक आभा

उदयपुर। श्रद्धा, आस्था और भक्ति से ओत-प्रोत माहौल में उदयपुर के भटियाणी चौहट्टा स्थित ऐतिहासिक माता महालक्ष्मी मंदिर में प्राकट्योत्सव का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। यह आयोजन न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण था, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी शहरवासियों के लिए एक अद्वितीय पर्व की तरह रहा। करीब 451 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन इस वर्ष भी पूरे उल्लास और गरिमा के साथ किया गया।
श्री श्रीमाली जाति संपत्ति व्यवस्था ट्रस्ट के अध्यक्ष भगवती लाल दशोत्तर ने बताया कि सुबह 5 बजे ब्रह्ममुहुर्त में माता महालक्ष्मी का पंचामृत से अभिषेक किया गया। यह अभिषेक करीब एक घंटे तक चला, जिसमें शास्त्रोक्त विधियों के अनुसार दूध, दही, शहद, घी और जल से माता महालक्ष्मी को स्नान कराया गया। इस दौरान मंदिर प्रांगण में वैदिक मंत्रों की ध्वनि गूंजती रही।


अभिषेक के बाद माता महालक्ष्मी का विशेष श्रृंगार किया गया। देवी को लाल रंग के परिधान में सजाया गया और उनके श्रृंगार में स्वर्ण व रजत आभूषणों की भरमार रही। सिर से लेकर चरणों तक मां महालक्ष्मी स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित थीं। इस अनुपम रूप में जब देवी के दर्शन प्रातः 7:15 बजे भक्तों के लिए खोले गए, तो श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
प्राकट्योत्सव के पावन अवसर पर पूरे दिन मंदिर में विविध धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। मुख्य आयोजन में हवन प्रमुख रहा, जिसमें आचार्य मनीष श्रीमाली के सान्निध्य में मुख्य यजमान जतिन श्रीमाली सहित पांच जोड़ों ने आहुतियाँ समर्पित कीं। हवन के अंत में पूर्णाहुति के साथ वातावरण एक अलौकिक ऊर्जा से भर उठा। इसके बाद श्रद्धालुओं ने मिलकर सुंदरकांड का पाठ किया, जिससे मंदिर प्रांगण रामभक्ति की रसधारा में डूब गया।
रात्रि 12 बजे जैसे ही महाआरती का समय आया, मंदिर परिसर भक्ति के समंदर में डूब गया। न केवल मंदिर के भीतर, बल्कि बाहर सड़क पर खड़े हजारों श्रद्धालु भी आस्था के साथ आरती में सम्मिलित हुए। घंटे-घड़ियालों की गूंज और ‘जय लक्ष्मी माता’ के नारों से संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। महाआरती के बाद श्रद्धालुओं को महाप्रसाद का वितरण किया गया। भक्तों ने बड़ी श्रद्धा के साथ प्रसाद ग्रहण किया और मां लक्ष्मी से सुख-समृद्धि की कामना की।
विभिन्न अनुष्ठानो मे पुरे दिन समाज के प्रतिनिधियों की मौजूदगी रही। समाज के रविंद्र जी श्रीमाली,मधुसूदन बोहरा, जयप्रकाश श्रीमाली, जतिन श्रीमाली, हेमेंद्र लाला, दिनेश लटावत, दिनेश श्रीमाली, प्रेम शंकर बोहरा, जयेश श्रीमाली, डॉ देवेंद्र श्रीमाली, हेमंत त्रिवेदी, कुलदीप श्रीमाली, गिरीश श्रीमाली, हर्षित श्रीमाली, जयंत श्रीमाली, मयंक श्रीमाली, रोहन श्रीमाली, भूपेंद्र श्रीमाली, प्रदीप श्रीमाली, धर्मेंद्र दवे ,लवेश श्रीमाली, जयंत ओझा एवं सैकड़ो की संख्या में समाजजन एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।
इस मंदिर का संचालन श्री श्रीमाली जाति संपत्ति व्यवस्था ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। यह मंदिर अपनी अद्भुत मूर्ति और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। यहां महालक्ष्मी जी कमल के बजाय गज (हाथी) पर विराजमान हैं, जो इसे अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारी बनाता है। इस मंदिर का निर्माण महाराणा जगत सिंह के शासनकाल में लगभग 451 वर्ष पूर्व हुआ था। तब से यह मंदिर उदयपुरवासियों की आस्था का केंद्र बना हुआ है और प्रत्येक वर्ष प्राकट्योत्सव पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां जुटते हैं।

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