आज तेंदुए “प्राकृतिक जंगल तंत्र” पर नहीं, बल्कि “मानव-आधारित खाद्य स्रोत” पर निर्भर होने लगे हैं
उदयपुर : “झीलों और पहाड़ों के शहर की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध जैव विविधता से होती है। अरावली की गोद में बसे इस क्षेत्र में फ्लोरल डायवर्सिटी अर्थात वनस्पति विविधता आज भी पर्याप्त दिखाई देती है। दूसरी ओर फॉनल डाइवर्सिटी यानी वन्यजीव विविधता लगातार कमजोर होती जा रही है। यही असंतुलन अब उदयपुर और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है।”
अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर ग्रीन पीपल सोसायटी एवं वन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में उपरोक्त विचार उभर कर आए । प्रतिभागियों ने स्थानीय स्तर पर कार्य करने पर बल दिया जिसका प्रभाव पूरी दुनिया में दिखाई दे ।
वरिष्ठ वन अधिकारी सेडू राम यादव, सुनील चिद्री, मुकेश सैनी, ग्रीन पीपल के अध्यक्ष राहुल भटनागर, सुहेल मजबूर , शैतान देवड़ा, यादवेन्द्र चुण्डावत ने उदयपुर क्षेत्र में तेंदुओं की बढ़ती आबादी के साथ घटते शाकाहारी जीवो की सख्या पर चिंता व्यक्त की तथा इनके संतुलन पर जोर दिया ।
श्याम दवे ने जैव विविधता को पी पी टी के माध्यम से विस्तार से बताया । पर्यावरणविद प्रो महेश शर्मा ने अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि आधिकारिक गणना के अनुसार पिछले वर्ष ज़िले में तेंदुओं की संख्या 130 थी , जबकि सेवानिवृत्त वरिष्ठ वन अधिकारी इसे 700–1000 तक आँकते हैं, तब यह बहस निरर्थक हो जाती है कि तेंदुए बढ़े हैं या नहीं। एक तेंदुए को साल भर में औसतन 40–50 बड़े शिकार चाहिए और उदयपुर के जंगलों में मुश्किल से 30–35 तेंदुओं के लिए पर्याप्त है। एक वर्ष पूर्व 10 इंसानों की मौत, दर्जनों पालतू पशुओं का शिकार लगातार गाँवों और शहरों में तेंदुओं की घुसपैठ, यह असंतुलित आबादी का परिणाम है। हम तेंदुओं की संख्या तो गिनते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि उनके लिए भोजन उपलब्ध है या नहीं ।
वन अधिकारियों ने बताया कि जंगलों में चीतल, सांभर, जंगली सूअर, खरगोश और अन्य छोटे वन्यजीवों की संख्या लगातार घट रही है। परिणामस्वरूप पेंथर भोजन की तलाश में गांवों, ढाणियों और शहर की सीमाओं तक पहुंचने लगे हैं। आज हर दिन उदयपुर के ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में पेंथर का दिखाई देना सामान्य घटना बन चुकी है। मवेशियों पर हमले बढ़ रहे हैं, कई स्थानों पर मानव जीवन भी खतरे में आया है। यह केवल वन विभाग की चुनौती नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर प्रश्न है। वन अधिकारियों ने बताया कि विडंबना यह है कि हम जंगल को केवल पेड़ों की संख्या से आंक रहे हैं। यदि जंगल में केवल हरियाली हो, लेकिन वहां शिकार प्रजातियां ही न बचें, तो वह जंगल पेंथर जैसे शीर्ष शिकारी के लिए जीवित पारिस्थितिकी तंत्र नहीं रह जाता।
वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते फॉनल डाइवर्सिटी को पुनर्स्थापित करने के गंभीर प्रयास नहीं हुए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और विकट हो सकती है। पेंथर आबादी बढ़ती रही और उनके लिए प्राकृतिक भोजन नहीं बढ़ा, तो संघर्ष और अधिक उग्र होगा। गांवों में भय, किसानों में असुरक्षा और वन्यजीवों में आक्रामकता — यह त्रिकोण भविष्य का बड़ा संकट बन सकता है।
उदयपुर आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यदि हमने केवल हरियाली को ही जैव विविधता मानने की भूल जारी रखी, तो आने वाले समय में अरावली का यह संतुलन गंभीर संकट में बदल सकता है। प्रकृति का संतुलन केवल पेड़ों से नहीं, बल्कि पेड़ों के बीच जीवित उस संपूर्ण जीवन-श्रृंखला से बनता है, जिसमें पेंथर भी है और उसका शिकार भी।
संगोष्ठी में शैतानसिंह देवड़ा, संजय गुप्ता, विनोद राय, वीरपाल राणा, यासीन पठान, डॉ ललित जोशी, डॉ विजय कोहली, डॉ सुमन भटनागर, अनिरुद्ध चुण्डावत, सुश्री प्रीति मुर्डिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

