गंभीर सांस फूलने और खांसी के साथ पहुंचा मरीज, एक्स-रे में दिखा कंसोलिडेशन; ब्रोंकोस्कोपी में मिला छिपा हुआ विदेशी पदार्थ
उदयपुर। पैसिफिक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (पिम्स), उमरड़ा में डॉक्टरों ने गंभीर सांस की तकलीफ से जूझ रहे एक मरीज के फेफड़े की सांस की नली में फंसे मक्के के छोटे से दाने को सफलतापूर्वक निकालकर मरीज को तत्काल राहत प्रदान की।
मरीज को बेहद गंभीर सांस फूलने, सांस लेने में परेशानी और खांसी की शिकायत के साथ पिम्स के आपातकालीन विभाग में लाया गया। जांच के दौरान छाती के एक्स-रे में एक हिस्से में कंसोलिडेशन दिखाई दिया। प्रारंभिक रूप से संक्रमण अथवा सांस की नली में रुकावट की आशंका बनी। मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्काल ब्रोंकोस्कोपी करने का निर्णय लिया गया। ब्रोंकोस्कोपी के दौरान दाईं ओर के लेटरल सेगमेंट में एक अप्रत्याशित विदेशी पदार्थ दिखाई दिया, जिसने सांस की नली को बाधित कर रखा था।

डॉक्टरों ने मेमोरी बास्केट की सहायता से इस विदेशी पदार्थ को सफलतापूर्वक बाहर निकाला। बाहर निकालने के बाद पता चला कि यह मक्के का एक दाना था। विदेशी पदार्थ निकलते ही मरीज की हालत में नाटकीय रूप से सुधार हुआ। सांस लेने में हो रही गंभीर परेशानी तेजी से कम हुई, मरीज आराम से सांस लेने लगा और उसके जीवन रक्षक मानक स्थिर रहे।
“छोटी चीज, बड़ा खतरा” — समय पर ब्रोंकोस्कोपी ने बचाई सांस :
पिम्स के चेयरमैन आशीष अग्रवाल ने कहा कि यह मामला इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कभी-कभी एक बेहद छोटा विदेशी पदार्थ भी सांस की नली में गंभीर रुकावट पैदा कर सकता है और मरीज को जानलेवा स्तर की श्वसन तकलीफ हो सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में समय पर की गई ब्रोंकोस्कोपी न केवल बीमारी के सही कारण का पता लगाने में मदद करती है, बल्कि उसी समय उपचार भी संभव बनाती है। उन्होंने कहा कि इस मरीज के मामले में एक छोटे से मक्के के दाने को निकालने से मरीज की सांस में तत्काल सुधार हुआ, जो आधुनिक ब्रोंकोस्कोपी की निदानात्मक और उपचारात्मक क्षमता को दर्शाता है।
यह सफल प्रक्रिया डॉ. मयूर देवराज, डॉ. राजू कोट्टाकोटा, डॉ. सनिध्या टाक, डॉ. करण राज सिंघल एवं डॉ. अनिरुद्ध एरॉन के मार्गदर्शन में श्वसन चिकित्सा विभाग की टीम द्वारा की गई। प्रक्रिया में रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. राज, डॉ. मुस्कान, डॉ. अमन, डॉ. दीक्षा, डॉ. श्याम, डॉ. मनीषा, डॉ. देवेंद्र, डॉ. मेधा, डॉ. तान्या, डॉ. पवन एवं डॉ. अजय तथा ब्रोंकोस्कोपी टीम के गिरिराज सिंह शक्तावत, राहुल कुमार एवं मांगीदेवी का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
पिम्स में समय पर हस्तक्षेप से मिली तत्काल राहत :
यह मामला चिकित्सकों के लिए भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि एक्स-रे में दिखाई दे रहा कंसोलिडेशन किसी अन्य बीमारी का संकेत दे सकता था। लेकिन ब्रोंकोस्कोपी ने वास्तविक कारण सामने ला दिया—सांस की नली में फंसा एक छोटा सा मक्के का दाना।
समय पर किए गए ब्रोंकोस्कोपिक हस्तक्षेप से न केवल सही निदान हुआ, बल्कि एक ही प्रक्रिया में सांस की नली की रुकावट को दूर कर मरीज को तत्काल राहत मिली।
यह मामला दर्शाता है कि श्वसन संबंधी गंभीर लक्षणों के पीछे कभी-कभी कोई छोटा-सा विदेशी पदार्थ भी गंभीर और जानलेवा स्थिति उत्पन्न कर सकता है तथा ऐसे मामलों में समय पर ब्रोंकोस्कोपी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
