रंगमंच जीवन के यथार्थ और सामाजिक बदलाव की सशक्त अभिव्यक्ति

जयपुर। रंगमंच मनुष्य के सुख, दुख, संघर्ष और अंतर्विरोधों को अभिव्यक्त करने के साथ समाज को अपनी स्थितियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। उसकी सार्थकता मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने और असुविधाजनक प्रश्नों को सामने लाने में है। यह विचार राजस्थान विश्वविद्यालय की ललित कला संकाय की पूर्व अधिष्ठाता एवं नाट्य विभाग की पूर्व अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व छात्रा प्रो. (डॉ.) अर्चना श्रीवास्तव ने व्यक्त किए।
वे कम्युनिकेशन टुडे और भारती विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मीडिया वेबिनार श्रृंखला के 243वें सत्र में ‘ज़िंदगी का यथार्थ बनाम समकालीन रंगमंच’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रही थीं।
उन्होंने आदिम रंगमंच से संस्कृत, पारसी और आधुनिक यथार्थवादी रंगमंच तक की विकास यात्रा की चर्चा करते हुए बताया कि सामाजिक परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ नाटकों के कथ्य और प्रस्तुति में बदलाव आता रहा है। अभिनय, संवाद, संगीत, दृश्य और दर्शकों की प्रतिक्रिया मिलकर रंगानुभव को समृद्ध बनाते हैं।
धर्मवीर भारती के ‘अंधा युग’ के संदर्भ में उन्होंने युद्ध की त्रासदी, विवेक के पराभव और मानवीय मूल्यों के संकट को रेखांकित किया। मोहन राकेश के ‘आधे अधूरे’ के माध्यम से पारिवारिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा, स्त्री स्वाभिमान तथा पूर्णता की तलाश पर विचार रखा। स्वदेश दीपक के ‘कोर्ट मार्शल’ के संदर्भ में सामाजिक भेदभाव और मानवीय गरिमा के प्रश्न उठाए।
उन्होंने असगर वजाहत और भीष्म साहनी के नाटकों के माध्यम से सांप्रदायिक तनाव, धार्मिक पाखंड और इंसानियत के सवालों की चर्चा की। रंगकर्मी एवं निर्देशक रमनजीत कौर की प्रस्तुति ‘बियॉन्ड बॉर्डर्स’ का उल्लेख करते हुए महिलाओं के अनुभवों और संघर्षों की अभिव्यक्ति का महत्व बताया।
इप्टा, जन नाट्य मंच और रंगकर्मी सफदर हाशमी के योगदान को याद करते हुए उन्होंने कहा कि रंगमंच की पहुँच सड़कों, बस्तियों, चौराहों और कारखानों तक होनी चाहिए। नुक्कड़ नाटक आमजन को अपने अधिकारों और सामाजिक विसंगतियों के प्रति जागरूक करने का माध्यम है।
विषय प्रवर्तन करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार केंद्र के पूर्व अध्यक्ष एवं कम्युनिकेशन टुडे के संपादक प्रो. संजीव भानावत ने कहा कि जीवन की बिखरी घटनाएँ अभिनय, संवाद, दृश्य और मौन के माध्यम से दर्शकों के अनुभव का हिस्सा बन जाती हैं। उन्होंने सामाजिक समूहों की आवाज़, पारस्परिक संबंधों की जटिलताओं और चुनौतियों के प्रति रंगमंच की जिम्मेदारी पर बल दिया।
कार्यक्रम की संयोजक एवं भारती विद्यापीठ की सहायक प्रोफेसर प्रियंका सिंह ने प्रारंभ में प्रार्थना प्रस्तुत की और अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने रंगमंच की सामाजिक चेतना जगाने की क्षमता को रेखांकित किया। मुख्य वक्ता को ई-सर्टिफिकेट और ई-स्मृति चिह्न भेंट किए गए।
आयोजन की सफलता में जयंत राठी, पुष्पेंद्र सिंह, श्रीकांत सिंह (भारती विद्यापीठ) तथा डॉ. पृथ्वी सेंगर (आईआईएमटी विश्वविद्यालय, मेरठ) का महत्वपूर्ण योगदान रहा।