कम्युनिकेशन टुडे और बीवीआईसीएएम के संयुक्त वेबिनार में संगीत की भूमिका पर विमर्श
जयपुर। संगीत व्यक्ति की भावनाओं को अभिव्यक्ति देने, कठिन समय में सहारा बनने और लोगों के बीच आत्मीय संवाद स्थापित करने का प्रभावी माध्यम है। उपयुक्त संगीत का चयन तनाव कम करने और मन को सुकून देने में सहायक हो सकता है। यह विचार महाराजा अग्रसेन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, रोहिणी, दिल्ली के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश चंद्र पाठक ने ‘म्यूजिक फॉर हीलिंग एंड कम्युनिकेशन’ विषयक वेबिनार में व्यक्त किए।
द्विभाषी मीडिया शोध पत्रिका ‘कम्युनिकेशन टुडे’ और भारती विद्यापीठ इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन्स एंड मैनेजमेंट (बीवीआईसीएएम), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस वेबिनार में संगीत के भावनात्मक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और संचार संबंधी आयामों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का संचालन और विषय प्रवर्तन कम्युनिकेशन टुडे के संपादक प्रो. संजीव भानावत ने किया। उन्होंने बताया कि कोविड के कठिन दौर में 2 अक्टूबर 2020 को शुरू हुई यह वेबिनार शृंखला छह वर्ष की विचार यात्रा पूरी कर चुकी है।
विषय की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए संपादक प्रो. संजीव भानावत ने कहा कि माँ की लोरी, लोकगीत, भजन और जीवन के विभिन्न अवसरों से जुड़े गीत हमारी स्मृतियों तथा भावनाओं का हिस्सा हैं। कभी कोई पुराना गीत आँखें नम कर देता है, तो कभी वही संगीत मुस्कुराने और जीवन से फिर जुड़ने का अवसर देता है। उन्होंने सामान्य संगीत सुनने और संगीत चिकित्सा के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि संगीत चिकित्सा में प्रशिक्षित विशेषज्ञ व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप गतिविधियाँ चुनते हैं। संगीत को आवश्यक चिकित्सकीय उपचार के सहायक के रूप में देखा जाना चाहिए।
कार्यक्रम के आरंभ में बीवीआईसीएएम के कंप्यूटर एप्लीकेशन्स विभाग के सहायक प्राध्यापक श्रीकांत सिंह ने मुख्य वक्ता का ई-पुष्पगुच्छ से स्वागत किया।
अपने व्याख्यान में विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश चंद्र पाठक ने संगीत को मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक जुड़े अनुभवों का अभिन्न अंग बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग परिस्थितियों में संगीत भावनात्मक राहत और उत्साह का स्रोत बन सकता है। इसके लिए व्यक्ति की रुचि, मनःस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप संगीत का चयन महत्वपूर्ण है। प्रत्येक प्रकार का संगीत हर व्यक्ति पर एक जैसा प्रभाव नहीं डालता।
संगीत और संवाद के संबंध को स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि बोलने की गति, स्वर के उतार-चढ़ाव, लय और शब्दों पर दिए जाने वाले बल का संबंध प्रभावी अभिव्यक्ति से है। संगीत की समझ इन पहलुओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। उन्होंने ध्यानपूर्वक सुनने की आदत विकसित करने पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, परिवार और समाज में दूसरों को सुनने तथा उनकी भावनाओं को समझने से संवाद अधिक सार्थक बनता है।
शिक्षा में संगीत की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने बच्चों की कविताओं और लयबद्ध शिक्षण के उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि गीत और लय के माध्यम से प्रस्तुत सामग्री को याद रखना आसान हो सकता है। परिचित धुनें पुरानी स्मृतियों को जगाती हैं और सीखने में सहभागिता बढ़ा सकती हैं। भारतीय संगीत के स्वर, श्रुति और रागों का परिचय देते हुए उन्होंने संगीत की संरचना और उसके भावनात्मक प्रभावों के संबंध पर भी प्रकाश डाला।
साहित्य और संगीत के रिश्ते पर उन्होंने कहा कि अनेक पुराने हिंदी फिल्मी गीतों की लोकप्रियता में उनके अर्थपूर्ण शब्दों और जीवन दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका है। गीतों में व्यक्त आशा, करुणा और जीवन के अनुभव श्रोताओं को अपनी परिस्थितियों से जुड़ने का अवसर देते हैं। लोकगीतों, संस्कार गीतों और सामूहिक गायन को उन्होंने सांस्कृतिक स्मृतियों तथा सामाजिक संबंधों को आगे बढ़ाने का माध्यम बताया।
मीडिया के संदर्भ में उन्होंने फिल्मों के पार्श्व संगीत, रेडियो कार्यक्रमों, विज्ञापन जिंगल और राजनीतिक अभियानों में संगीत के उपयोग की चर्चा की। उन्होंने समझाया कि पार्श्व संगीत दृश्य के भाव और अर्थ को प्रभावी बनाता है, जबकि जिंगल किसी संदेश को लंबे समय तक याद रखने में मदद कर सकता है। ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ और ‘एक चिड़िया, अनेक चिड़ियाँ’ जैसे उदाहरणों से उन्होंने साझा स्मृतियाँ बनाने में संगीत की भूमिका स्पष्ट की।
प्रश्नोत्तर सत्र में मेरठ के डॉ. सूरजदेव प्रसाद, दिल्ली के डॉ. रमेश शर्मा और हरियाणा के डॉ. दयानंद कादियान ने चर्चा में भाग लिया। इस दौरान युद्ध और शांति, बदलती संगीत रुचियों तथा दैनिक जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के विषय उठे। मुख्य वक्ता ने कहा कि संवाद की कमी विवाद और दुख को बढ़ाती है। उन्होंने नई पीढ़ी को साहित्य तथा सांस्कृतिक अनुभवों से जोड़ने में परिवार और शिक्षकों की जिम्मेदारी रेखांकित की। मोबाइल पर लगातार समय बिताने के स्थान पर पढ़ने, सुनने और आपसी बातचीत के लिए समय निकालने का आग्रह किया।
दैनिक जीवन में संगीत के उपयोग से जुड़े प्रश्न के उत्तर में उन्होंने अपनी रुचि का संगीत नियमित रूप से सुनने का सुझाव दिया। उन्होंने विभिन्न जीवन स्थितियों में भावनात्मक सहारा देने वाले 50 हिंदी फिल्मी गीतों की सूची का उल्लेख किया।
सत्र में सहायक प्राध्यापक श्रीकांत सिंह ने मुख्य वक्ता को ई-प्रमाणपत्र और ई-स्मृति चिह्न प्रदान किया। समापन पर कम्युनिकेशन टुडे के संपादक प्रो. संजीव भानावत ने मुख्य वक्ता और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने आशा जताई कि संगीत के प्रति जागरूकता जीवन में नई ऊर्जा और आत्मीयता बढ़ाने में सहायक होगी। उन्होंने नवरात्रि तथा विजयदशमी की शुभकामनाएँ भी दीं।
