पूर्वजों की धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने किए श्री जगन्नाथ रायजी के दर्शन

उदयपुर। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर मेवाड़ की गौरवशाली एवं प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए मेवाड़ के 77वें श्री एकलिंग दीवान, श्रीजी हुजूर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने श्री जगन्नाथ रायजी (जगदीश मंदिर) में दर्शन कर विशेष सेवा-पूजा एवं भेंट अर्पित कर, मेवाड़ की सुख-समृद्धि, शांति और उन्नति के लिए प्रार्थना की।
इस अवसर पर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ अपनी धर्मपत्नी श्रीमती निवृत्ति कुमारी मेवाड़ सुपुत्र महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़, सुपुत्री बाईजीलाल मोहलक्षिका कुमारी मेवाड़ एवं बाईजीलाल प्राणेश्वरी कुमारी मेवाड़ तथा अपने सास-ससुर ओडिशा के उपमुख्यमंत्री कनकवर्धन सिंह देव पटना बालंगीर ओडिशा एवं उनकी धर्मपत्नी बालंगीर लोकसभा सांसद संगीता कुमारी सिंह देव पटना बालंगीर के साथ मंदिर पधारे। उनके आगमन पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्री एकलिंगनाथजी एवं भगवान जगन्नाथ स्वामी के जयघोष कर उनका स्वागत किया तथा पुष्पवर्षा कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की। डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने भी सभी श्रद्धालुओं का आत्मीय अभिवादन स्वीकार किया।
उल्लेखनीय है कि मेवाड़ के इस सुविख्यात एवं ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण मेवाड़ के 57वें श्री एकलिंग दीवान महाराणा जगत सिंह प्रथम द्वारा करवाया गया था। मंदिर की प्रतिष्ठा विक्रम संवत् 1709 की वैशाख पूर्णिमा को सम्पन्न हुई थी। तभी से मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा यहां विविध धार्मिक अनुष्ठान, मनोरथ, उत्सव तथा दान-पुण्य के आयोजन संपन्न कराए जाते रहे हैं। रथयात्रा, अन्नकूट महोत्सव, ध्वजा दर्शन एवं पुरुषोत्तम मास के विशेष आयोजन इस परंपरा के प्रमुख अंग रहे हैं।
महाराणा स्वरूप सिंह, महाराणा फतह सिंह तथा महाराणा भूपाल सिंह के बहिड़ों एवं ऐतिहासिक अभिलेखों में इन धार्मिक आयोजनों और विशेष दर्शनों का विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है। विशेष रूप से महाराणा स्वरूप सिंह जी भगवान विष्णु के अनन्य उपासक थे और वे नियमित रूप से विभिन्न विष्णु मंदिरों में दर्शन हेतु पधारते थे, जिनमें श्री जगन्नाथ रायजी मंदिर दर्शन का विशेष स्थान रहा है।
अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित इसी गौरवशाली परंपरा का अनुसरण करते हुए डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने पूर्ण श्रद्धा, भक्ति एवं आस्था के साथ भगवान श्री जगन्नाथ रायजी के दर्शन कर मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को जीवंत बनाए रखा। 
श्री जगन्नाथराय जी, जगदीश मंदिर, उदयपुर का इतिहास:
महाराणा जगत सिंह जी ने राजमहलों से थोड़ी दूर उत्तर में ठाकुर जी श्री जगन्नाथराय जी का भव्य विष्णु पंचायतन मंदिर बनवाया। पंचायतन मंदिर में मध्य का मुख्य विशाल मंदिर श्री हरि विष्णु का होता है, उसी पंचायतन नियमानुसार महाराणा जगतसिंह जी ने गूगावत पंचोली कमल के पुत्र अर्जुन की निगरानी और भंगोरा गोत्र के सूत्रधार (सुथार) भाणा और उसके पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बनवाया था। मंदिर की प्रतिष्ठा चैत्रादि वि.सं. 1709 वैशाखी पूर्णिमा (श्रावणादि 1708, ई.स. 1652, 13 मई) गुरुवार को बडे़ समारोह और व्यय के साथ हुई थी। इस अवसर पर हजार गायें, सोना, घोड़े के साथ ही 5 गांव ब्राह्मणों को दान दिये गये थे। मंदिर बनाने वाले सूत्रधार भाणा और उसके पुत्र मुकुन्द को सोने और चांदी के गज तथा चित्तौड़ के पास का एक गांव प्रदान किया। इस मन्दिर की विशाल प्रशस्ति की रचना कृष्णभट्ट से करवाई थी। उदयपुर के विष्णु मन्दिरों में सबसे बड़ा शिखरबंध और प्रसिद्ध मन्दिर है, जिसमें विष्णु भगवान् की चतुर्भुज श्याम मूर्ति बड़ी ही सुन्दर और विशाल है। मन्दिर की कुर्सी बहुत ऊँची है। सड़क से 32 सीढ़ी ऊपर चढ़कर जाना होता है। परिक्रमा में सूर्य, शक्ति, गणपति, शिव की चार शिखर बंध देवलियें हैं। सभा मण्डप के सन्मुख छत्री में पीतल की गरुड़ की मूर्ति दर्शनीय है।
महाराणा जगत्सिंह प्रथम जगन्नाथ स्वामी के अनन्य भक्त थे उन्होंने तीर्थ यात्रा की, काशी तथा जगन्नाथपुरी में महल बनवाए। उस समय यात्रियों को बार-बार इच्छानुसार जगन्नाथपुरी की यात्रा करना सुलभ न था, अतः उन्होंने उदयपुर में भगवान जगन्नाथ राय जी (जगदीश्वर/जगदीश) का विशाल देवालय बनाकर अपनी भक्ति का परिचय दिया। इस मन्दिर की प्रतिष्ठा के अवसर पर जगतसिंह जी ने रत्नों का कल्पवृक्ष बनाकर दान किया।

Creative from India to the World