हरियाली अमावस्या पर सिटी पैलेस में हुआ हरियाली पूजन

हरियाली अमावस्या: मेवाड़ की परम्परा में प्रकृति, आस्था और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
उदयपुर।
प्रकृति के श्रृंगार और शिव आराधना का पर्व हरियाली अमावस्या मेवाड़ में आस्था, परम्परा और पर्यावरण चेतना का अनूठा संगम है। सावन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व वर्षा ऋतु के आगमन, हरियाली के विस्तार और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की समृद्ध मेवाड़ी परम्परा का प्रतीक रहा है।
मेवाड़ में सावन मास के प्रत्येक सोमवार को ‘सुखिया सोमवार’ के रूप में मनाने की परम्परा रही है। हरियाली अमावस्या के अवसर पर मेवाड़ के अधिपति परमेश्वरांजी महाराज श्री एकलिंगनाथ जी को चांदनिया प्रिंट का हरा लेहरिया धराने की परम्परा आज भी इस पर्व की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। भगवान शिव की आराधना के साथ हरियाली पूजन का यह विधान प्रकृति और जीवन के बीच मेवाड़ की गहरी आत्मीयता को दर्शाता है।
हरियाली अमावस्या पर मेवाड़ के शिवालयों के साथ-साथ घर-घर में भी हरियाली पूजन की परम्परा रही है। सिटी पैलेस के जनाना महल से महिलाएं पारम्परिक वेशभूषा में बैंड-बाजों एवं ढोल की धुन के साथ रामेश्वर घाट गीत गाती हुई पहुंची। रामेश्वर घाट पर पीपल वृक्ष और जल का पूजन कर प्रकृति के प्रति श्रद्धा अर्पित की। यह दृश्य मेवाड़ की जीवंत लोक-संस्कृति और सदियों पुरानी पर्यावरणीय चेतना का सजीव प्रतीक है। इस दिन विशेष रूप से हरे रंग के लेहरिया परिधान धारण कर उत्सव मनाने की परम्परा है।
मेवाड़ के 77वें श्री एकलिंग दीवान श्रीजी हुजूर डॉ. लक्ष्यराज सिंह जी मेवाड़ की पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता इस प्राचीन परम्परा को आधुनिक संदर्भ प्रदान करती है। ‘गो ग्रीन’ और ‘सेव वाटर’ जैसे अभियानों के माध्यम से वे निरंतर विद्यालयों एवं आम नागरिकों को जल संरक्षण, हरित पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देते रहे हैं। मेवाड़ की परम्परा में प्रकृति पूजन केवल एक धार्मिक विधान नहीं, बल्कि प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति कृतज्ञता की जीवन-पद्धति रही है।
हरियाली अमावस्या इसी विचार को पुनः स्मरण कराने वाला पर्व है – जहां हरियाली केवल धरती का श्रृंगार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और संतुलित भविष्य का संकल्प भी है।

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