विरासत सजावट की वस्तु नहीं —

विरासत सजावट की वस्तु नहीं —
(उदयपुर के राजकीय संग्रहालय की जीवंत विरासत को इंटीरियर डेकोरेशन के उत्पाद बना दिए गए )
 उदयपुर :
विश्व विरासत दिवस की पूर्व संध्या पर  भारतीय सांस्कृतिक निधि : इंटेक के बैनर तले शहर के प्रबुद्ध लोगों ने मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक जीवंत  विरासत को सजावट की वस्तु बनाने पर गहरा असंतोष प्रकट किया तथा छिन्नन्न भिन्न की गई विरासत को पुनः उदयपुर लाने की मांग की । इंटेक वर्किंग ग्रुप प्रभारी प्रो. महेश शर्मा ने बताया कि  विश्व विरासत दिवस  एक गंभीर चेतावनी  लेकर आया है—जहां मेवाड़ की  जीवित विरासत की सुरक्षा पर गंभीर संकट मंडरा रहा है ।
  “संघर्ष और आपदाओं के बीच जीवित विरासत की सुरक्षा ” केवल  औपचारिक थीम नहीं, बल्कि मेवाड़ की नष्ट होती  विरासत की  हकीकत का आईना है। विशेषकर उदयपुर जैसे ऐतिहासिक शहर में, जहां विरासत केवल अतीत नहीं, बल्कि जीवित परंपरा है।
 डॉ श्रीकृष्ण जुगनू, डॉ विवेक भटनागर, सतीश श्रीमाली , डॉ विनोद अग्रवाल, डॉ पीयूष भादविया प्रो. महेश शर्मा ने बताया कि  लिविंग हेरिटेज  में मेवाड़ की लघु चित्रकला परंपरा का विशेष स्थान है। मुल्ला द प्याजा, पंचतंत्र, एकलिंग माहात्म्य, एकादशी माहात्म्य, सारंगधर, मालती माधव, सूरसागर, बिहारी सतसई, आनंद लहरी, दर्शना री पोथी, गीत गोविंद, बारहमासा, रसिक प्रिया, कादम्बिनी, मेवाड़ रामायण  तथा बेली कृष्ण रुक्मिणी  जैसी कई सदियों पुरानी  चित्रित श्रृंखलाएं केवल कला नहीं, बल्कि उस युग की संवेदनाओं, भक्ति और सौंदर्यबोध के जीवंत दस्तावेज हैं। (इनमें से बहुमूल्य मेवाड़ रामायण ब्रिटिश लाइब्रेरी की शोभा बढ़ा रही है ।) इनका स्थान संग्रहालयों में सुरक्षित संरक्षण और सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, ताकि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रह सके।
किन्तु विडंबना यह है कि उदयपुर का राजकीय संग्रहालय, जो इन धरोहरों का संरक्षक होना चाहिए, वही आज सवालों के घेरे में है। पिछले कुछ वर्षों में यहां से कई महत्वपूर्ण पेंटिंग्स  श्रृंखलाओं में से जयपुर के कई  सरकारी अधिकारी अपनी पसंद की पेंटिंग्स को चुन कर  विधानसभा भवन और अन्य स्थानों की सजावट के लिए ले गए तथा कई श्रृंखलाओं को तोड़ दिया गया । यह कृत्य न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
विरासतविदों ने सवाल खड़े किए कि क्या  हमारी विरासत केवल दीवारों की शोभा बढ़ाने के लिए है? क्या सदियों पुरानी इन अमूल्य कृतियों का महत्व इतना ही रह गया है कि वे सरकारी  दफ्तरों के लिए इंटीरियर  डेकोरेशन का हिस्सा बन कर सजावट के लिए काम आए ? यह सोच न केवल संरक्षण के सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि मेवाड़ की  जनता के अधिकारों का भी हनन है। संग्रहालयों में रखी धरोहरें किसी व्यक्ति या विभाग की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि समाज की साझा विरासत  हैं। इन हज़ारों की संख्या में  बहुमूल्य पेंटिंग्स को गोदामों में बंद कर रखा है। उल्लेखनीय है कई वर्षों पूर्व मेवाड़ रामायण की एक एक पेंटिंग्स का मूल्य एक-एक करोड़ रुपया आंका गया था जबकि हमारे संग्रहालय में उससे भी पुरानी तथा बहुमूल्य पेंटिंग्स है जिन्हें केवल दीमक का इंतजार है ।

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इसका  सीधा प्रभाव भी सामने  है, उदयपुर के राजकीय  संग्रहालय में दर्शकों की संख्या लगातार घटी है और आय भी नगण्य स्तर तक सिमट गई है। यह स्थिति केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के क्षरण का संकेत है। आज आवश्यकता है कि इस गंभीर विषय पर तुरंत संज्ञान लिया जाए। जिन पेंटिंग्स को संग्रहालय के संग्रह  से हटाया गया है, उन्हें तत्काल वापस लाया जाए और वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाए। साथ ही, उन्हें आमजन के लिए प्रदर्शित किया जाए, ताकि लोग अपनी विरासत को देख सकें, समझ सकें और उससे जुड़ सकें। विश्व विरासत दिवस का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हम अपनी धरोहरों को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी संरक्षित करें। विरासत को सजावट का साधन नहीं, बल्कि पहचान का आधार समझना होगा। यदि आज भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस बात के लिए माफ नहीं करेंगी कि हमने अपनी ही धरोहर को अपने हाथों से ओझल कर दिया।