उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान में श्रावण मास के अवसर पर आयोजित शिव कथा श्रृंखला में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने शिव-सती विवाह प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि राजमहलों के सुख-सुविधाओं को छोड़कर कैलाश पहुँची माता सती को किसी वैभव के छूटने का मलाल नहीं था। उनके लिए सबसे बड़ा सुख परम योगी भगवान शिव का साथ पाना था। उन्होंने शिव के त्याग, तप और सादगी को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया।
अग्रवाल ने शिव-सती संवाद का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि माता सती ने भगवान शिव से पूछा कि सृष्टि में श्रेष्ठ क्या है, जीव जन्म-मृत्यु के बंधन से कैसे मुक्त हो सकता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग क्या है। भगवान शिव ने धर्म, योग, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और संत सेवा को मोक्ष का आधार बताया। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अहंकार और मोह से ऊपर उठकर सेवा, साधना और भक्ति को जीवन का आधार बनाता है, तभी आत्मज्ञान की अनुभूति होती है।
अग्रवाल ने कहा कि शिव पुराण के शिव-सती संवाद केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले संदेश हैं। इनका आचरण व्यक्ति को आत्मकल्याण के साथ लोक कल्याण की राह दिखाता है। उन्होंने कहा कि जिसने हमारे जीवन में किसी भी रूप में उपकार किया हो, उसकी उपेक्षा करना कृतघ्नता है। उपकार को याद रखना और जरूरतमंद के जीवन में सहारा बनना ही सच्ची मानवता है।
दिव्यांगजनों की पीड़ा और उम्मीद को करीब से जाना: कथा के दौरान अग्रवाल ने संस्थान में उपचार एवं पुनर्वास सेवाएं ले रहे दिव्यांगजनों और उनके परिजनों से आत्मीय संवाद किया। अयोध्या के ब्रिजेश कुमार, पश्चिम बंगाल के अजीमुद्दीन शेख व राधी हेमरोम, उत्तर प्रदेश के अनुभव तथा उदयपुर की मोनिका कुमारी सहित अन्य लाभार्थियों से उन्होंने उपचार से पहले की कठिनाइयों, कृत्रिम अंग मिलने के बाद आए बदलाव और पुनर्वास सेवाओं से मिली नई उम्मीद के बारे में जाना।
परिजनों से भी उन्होंने सेवा व्यवस्था और सुविधाओं के अनुभव पूछे। कई लाभार्थियों ने बताया कि उपचार के बाद उनके लिए जीवन फिर से सामान्य होने लगा है। जिन कदमों में कभी बेबसी थी, उनमें अब आत्मविश्वास है और जिन चेहरों पर चिंता थी, वहां भविष्य को लेकर उम्मीद दिखाई देती है।

