सुनना सीखने से व्यक्ति तरता है : प्रशांत अग्रवाल

उदयपुर । नारायण सेवा संस्थान में चल रही ‘भोलेनाथ के चरणों में अपनों से अपनी बात’ कथा में बुधवार को संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने सावन मास में ‘श्रावण यानी सुनने’ की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि आज हर कोई अपनी बात सुनाना चाहता है, लेकिन दूसरे को सुनने के लिए तैयार नहीं है। यही असहमति और झगड़ों का बड़ा कारण है। जीवन में शांति और संबंधों की मधुरता के लिए सुनने की कला विकसित करना जरूरी है।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में श्रवण का विशेष महत्व रहा है। वेदों का ज्ञान भी श्रुति परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा। उन्होंने महाभारत के प्रसंग से समझाया कि सही समय पर सही बात सुनना जीवन की दिशा बदल सकता है।
उन्होंने बताया कि अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे अजन्मे बालक पर अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चला दिया था। भयभीत उत्तरा भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुंची। भगवान ने सूक्ष्म रूप से गर्भ में प्रवेश कर बालक की रक्षा की। यही बालक आगे चलकर परीक्षित कहलाया। गर्भ में उसने एक ज्योतिर्मय पुरुष के दर्शन किए थे। जन्म के बाद वह प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे में उसी दिव्य पुरुष को खोजता रहा। इसी कारण उसका नाम परीक्षित पड़ा।
उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित के शासन में प्रजा सुखी थी। दिग्विजय यात्रा के दौरान उन्होंने धर्म और न्याय की स्थापना की तथा कलियुग के प्रभाव को नियंत्रित किया। यात्रा में शिकार से थके परीक्षित जल की तलाश में ऋषि शमीक के आश्रम पहुंचे। ऋषि को ध्यानमग्न देखकर उन्होंने आवेश में उनके गले में मृत सर्प डाल दिया। इससे क्रोधित ऋषि-पुत्र ने उन्हें सातवें दिन तक्षक नाग के डसने का शाप दे दिया।
शाप की जानकारी मिलने पर परीक्षित ने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और गंगा तट पर मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे। उन्होंने ऋषि-मुनियों से पूछा कि मृत्यु के निकट मनुष्य को क्या करना चाहिए। तभी उनकी भेंट शुकदेव से हुई। शुकदेव ने उन्हें भगवान की लीलाओं का श्रवण करने की प्रेरणा दी।
अग्रवाल ने कहा, “सुनाने वाले बहुत हैं, सुनने वाले कम। जीवन के उद्धार के लिए केवल बोलना नहीं, सही बात को सुनना भी सीखना होगा।” उन्होंने शिव भक्त कन्नप्पा, माता-पिता के भक्त श्रवण कुमार और नवधा भक्ति के प्रसंग भी सुनाए। उन्होंने कहा कि श्रवण मनुष्य को ज्ञान, विवेक और आत्मबोध की ओर ले जाता है। कथा में दिव्यांगजन और उनके परिजन भी मौजूद रहे।