हम धरती मां के प्रति संवेदनशील रहें

शांतिपीठ की ओर से पृथ्वी दिवस के संवाद
उदयपुर। 
धरती माता की गोद में ही व्यक्ति और समाज के विकास की अवधारणा पल्लवित हुई ओर यहीं से पृथ्वी एवं प्रकृति के संरक्षण संवर्धन की चेतना व्यक्ति और समाज में स्वधर्म के रूप में विकसित हुई जिसे आधुनिक विकास के अशान्त दौर में भूलाया जा चुका है। भारतीय जीवन और संस्कृति में श्रद्धा पूर्वक प्रकृति पूजन की परम्परा है जो पूरी तरह विज्ञान सम्मत है। राष्ट्र आदि काल से देवत्व का आह्वान वन, वनस्पति और जल से करता आ रहा है जो असल में वैदिक आधार पर है, प्रकृति पूजन वेद संस्कृति है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वेद को स्वीकार किया है जो दुनिया को सकारात्मक जीवन शैली में लौटने के लिए नियामक की भूमिका अदा कर सकता है। अब भी वक्त है हम प्रकृति की हिदायतों और नियमों की ओर लौट आएं तो जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण क्षरण के अभूतपूर्व संकटों से मुक्ति पा सकते हैं।
उक्त अनुभव शान्तिपीठ संस्थान के तत्वावधान में विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर नगर के प्रबुद्ध जन, इतिहासकार, पर्यावरणविद्, कलाविद् आदि के दो दिवसीय संवादों में उभर कर आए। उन्होंने उक्त दिवस को ‘सेलीब्रेशन नहीं ‘ओब्जर्वेशन’ अहसास दिवस के रूप में स्वीकार किया और मौके पर पाया कि लोभ प्रवत्ति के कारण पहाड़ियों, नदी नाला, तालाबों के साथ अन्याय हो रहा है और इन अपराधों के खिलाफ लोगों में आक्रोश भी है। उन्हें चिंता अवश्य है कि मेवाड़ की प्राकृतिक निधि को उजाड़ कर कहीं रेगिस्तान बनाने का षड्यंत्र तो नहीं है। रामा, एकलिंग जी, चिरवा आदि गांवों के संवेदनशील लोग चिंतित अवश्य हैं। यह आक्रोश कभी विवेकपूर्वक शौर्य में अवश्य रूपान्तरित हो सकता है।
मेवाड़ के महाराणाओं ने जिस तरह नैसर्गिक विरासत हमें सौंपी इसी तरह हम भी नई पीढ़ी को विरासत सौंपे, इस संकल्प के साथ ही सरकार से आग्रह किया कि पर्यावरण निगरानी दल गठित कर समग्र पारिस्थितिकी एवं जैवविविधता को सुरक्षित करने के उपाय सुनिश्चित करें।
कॉलेज ऑफ फिशरीज के पूर्व डीन एवं वरिष्ठ पर्यावरविद् प्रो. लक्ष्मीलाल शर्मा ने पर्यावरण संरक्षण पर पुनर्विचार की आवश्यकता पर जोर दिया। हालाँकि जागरूकता बढ़ी है, लेकिन वर्तमान संरक्षण प्रयास अधिकतर सतही हैं और अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। वायु, जल और जैव विविधता संरक्षण में ठोस सुधार अभी भी सीमित है। अब प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से आगे बढ़कर व्यावहारिक, प्रभावी और जनभागीदारी आधारित प्रयासों की जरूरत है। जब तक योजनाएँ जमीन पर परिणाम नहीं देंगी, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है। इस वर्ष का संदेश स्पष्ट है, पृथ्वी को बचाने की शक्ति हमारे पास है, पर इसे जिम्मेदारी और ठोस कार्यों में बदलना आवश्यक है।
शान्तिपीठ के संस्थापक अनन्त गणेश त्रिवेदी ने मार्टिन लूथर किंग को उद्धृत करते हुए कहा कि कहीं पर भी किया गया अन्याय सर्वत्र व्याप्त न्याय को एक गंभीर चुनौती है। उन्होंने पृथ्वी दिवस को प्रकृति से हो रहे अन्याय का प्रतिकार दिवस कहा और चिंता व्यक्त की कि यहां के मगरे मेवाड़ का मान हैं, हमें मान मर्दन को पुरजोर अस्वीकार करना चाहिए। पृथ्वी हमारी दिव्य विरासत है, यदि दिव्यता को अक्षुण्ण रखना है तो समय आ चुका है कि हमारे प्रदेश के शौर्य का पुनर्जागरण एकजुटता के साथ प्रस्तुत हो अन्यथा लोभी और तामसिक शक्तियां हावी होती रहेंगी। हमें विस्मृत नहीं करना चाहिए कि प्रबुद्ध एवं जागरुक नागरिक आवाम की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है, आवश्यकता है जनमत प्रतिनिधि और आत्म प्रतिनिधियों का समुचित समन्वय स्थापित हो और कानून भी सक्रिय रूप से धरातल पर उतर आए।
डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने कहा कि पृथ्वी अनेक रूपों में एक संग्रहालय जैसी रचना है और धातु – धन, पाषाण रत्न, वन वनस्पति, पहाड़, गर्त, नाल और घाटियां सब धरा की विशेषताएं जो प्राणिमात्र की सांस और आस है। उनका अपरिमित दोहन और नष्ट भ्रष्ट करके हम न तो वर्तमान और न ही भविष्य को सुरक्षित रख सकेंगे। हमारे मनसा वाचा कर्मणा आचार विचार भूमि के प्राकृतिक स्वरूप और यथारूप सौंदर्य को बनाए और बचाए रखने के होने चाहिए। यह समायोचित और न्यायोचित है।
मो.सु.वि.विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष डी एस राठौड़ ने कहा कि पृथ्वी दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि पृथ्वी की अपनी सीमाएँ हैं और मानव गतिविधियों के लगातार बढ़ते प्रभाव इन सीमाओं को प्रभावित कर रहे हैं। उदयपुर की अरावली पहाड़ियों में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी करते हुए हो रहा अनियंत्रित कटान एक गंभीर पारिस्थितिक असंतुलन की ओर संकेत करता है। एक पर्यावरणविद् के रूप में यह स्पष्ट है कि यह प्रक्रिया केवल भूमि के आकार में परिवर्तन नहीं है, बल्कि पूरे प्राकृतिक तंत्र की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है। अरावली पर्वतमाला क्षेत्रीय जल संतुलन बनाए रखने, मिट्टी को स्थिर रखने तथा प्राकृतिक पोषक चक्रों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पहाड़ियों के कटान से वर्षा जल के जमीन में समाने की क्षमता घट जाती है और पानी का बहाव बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी का तेजी से कटाव होता है। इसके परिणामस्वरूप अधिक मात्रा में मिट्टी बहकर जलाशयों में जमा होती है, जिससे उनकी जल संग्रहण क्षमता कम हो जाती है और अचानक बाढ़ जैसी स्थितियों की संभावना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक ढालों के हटने से भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरता है। अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में यह स्थिति लंबे समय तक चलने वाले जल संकट को जन्म दे सकती है। यह हस्तक्षेप स्थानीय स्तर पर मौसम में भी परिवर्तन लाता हैकृजैसे भूमि की ऊष्मा को परावर्तित करने की क्षमता में बदलाव, वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन में कमी तथा वर्षा के पैटर्न में अस्थिरता। व्यापक रूप से यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और अधिक बढ़ा सकता है तथा पारंपरिक ऋतु चक्र को प्रभावित करता है। जैविक दृष्टि से, यह प्रक्रिया जीवों के आवासों के टूटने और प्रजातियों के कम होने का कारण बनती है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र की स्वयं को संभालने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। सबसे गंभीर चिंता यह है कि कई परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की प्रक्रिया को या तो औपचारिकता तक सीमित कर दिया जाता है या पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है, जिससे कुल पर्यावरणीय प्रभावों का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता। हमें वैज्ञानिक समाधान सोचना पड़ेगा। भौगोलिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के आधार पर ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित कर “कटान निषेध क्षेत्र” घोषित किया जाए। सभी परियोजनाओं के लिए समग्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन तथा क्षेत्र की वहन क्षमता का अध्ययन अनिवार्य किया जाए। ढाल को स्थिर करने के लिए घास, पौधों और उपयुक्त संरचनात्मक उपायों का उपयोग किया जाए। कंटूर खाइयाँ, छोटे बाँध और जल संचयन संरचनाओं के माध्यम से भूजल पुनर्भरण को बढ़ाया जाए। सैटेलाइट और ड्रोन के माध्यम से नियमित निगरानी कर अवैध कटान पर नियंत्रण रखा जाए। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वालों पर दंड और क्षतिपूर्ति की व्यवस्था सख्ती से लागू की जाए। यदि विकास गतिविधियाँ प्रकृति की सीमाओं से आगे बढ़ती हैं, तो वे ऐसे पर्यावरणीय नुकसान को जन्म देती हैं जिसकी भरपाई संभव नहीं होती। उदयपुर की पहाड़ियाँ केवल भू-आकृतिक संरचनाएँ नहीं, बल्कि एक स्व-नियंत्रित प्राकृतिक तंत्र हैंकृइनका संरक्षण ही वास्तविक सतत विकास की आधारशिला है।
पूर्व देवस्थान आयुक्त दिनेश कोठारी ने कहा कि हम सब जो जन्म लेते है, पृथ्वी मां से जीवन प्राप्त करते हैं, सबको एक दिन चले जाना है, परन्तु इस पृथ्वी मां वसुंधरा को यही रहना है, हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को ऐसे ही जीवन दायिनी बनाए रखने का दायित्व हमारा है, ताकि हमारी आगामी पीढ़ियों सुरक्षित और संरक्षित रहे, 2026 का पृथ्वी दिवस का नारा है रू अवर पावर, अवर प्लेनेट। ये पृथ्वी मां ही हमारी शक्ति है, इसे बचाने को हम पानी, ऊर्जा, और संसाधनों का उपयोग सीमित करे, प्रदूषण में कमी लाए, प्लास्टिक और हानिकारक केमिकल का उपयोग नहीं करे, पेड़ लगाए, जल, जमीन और जंगल को बचाए। उदयपुर के संदर्भ में कहा जाए तो यहां के पहाड़, झीलें और नदिया संकट में है। बढ़ती आबादी और बढ़ती आवश्यकताओं ने इन खूबसूरत संसाधनों को बर्बाद कर दिया है, लोग आहत हैं और इनको बचाने, इस शहर को बचाने के लिए उद्वेलित है, एक प्रभावशाली साझा मंच की जरूरत है ताकि जिम्मेवार लोगों और संस्थाओं को मजबूर किया जा सके।
बी. एन. कॉलेज के डॉ. कमलसिंह राठौड़ ने कहा जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षरण से लड़ने के लिए मजबूत और तत्काल कार्रवाई की वैश्विक मांग तेज हो गई है। आइए, हम सब मिलकर अपने ग्रह को बचाएं! प्लास्टिक का उपयोग कम करें। पेड़ लगाएं और हरियाली बढ़ाएं। ऊर्जा बचत करें और नवीकरणीय स्रोत अपनाएं। आज से शुरू करें, कल हमारे लिए बेहतर ग्रह बनाएं!
संवाद – संगोष्ठी में सिंचाई विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता ज्ञान प्रकाश सोनी, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता उमेश चन्द्र शर्मा आदि की सक्रीय भागीदारी रही।

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