राजस्थान के लोककलाकारों ने नृत्य को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाने में किया संघर्ष : डॉ. भानावत

राजस्थान दिवस पर विस्तार व्याख्यान
उदयपुर।
मोहनलाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय के संघटक महाविद्यालय वाणिज्य एवं प्रबंध महाविद्यालय में राजस्थान दिवस पर ‘राजस्थान की लोकसंस्कृति’ विषय पर विस्तार व्याख्यान का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता भारतीय लोककलामंडल के पूर्व निदेशक लोककलाविज्ञ डॉ. महेन्द्र भानावत थे। अध्यक्षता महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. पी. के. सिंह ने की। विशिष्ठ अतिथि व्यवसाय प्रशासन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. राजेश्वरी नरेन्द्रन, बैंकिंग एवं व्यवसाय अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मुकेश माथुर तथा लेखा एवं व्यवसाय सांख्यिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. शूरवीरसिंह भाणावत थे।
इस अवसर पर डॉ. महेन्द्र भानावत ने कहा कि राजस्थान की पहचान इसकी लोककला, लोकनृत्य एवं अन्य लोकधर्मी परम्पराओं से है। इन परम्पराओं को जीवित रखने लिए राजस्थान के भारतीय लोककला मंडल ने सबसे पहले बीड़ा उठाया जिसके कारण ये कलाएं और इनसे जुड़े कलाकारों द्वारा राजस्थान की कठपुतली कला, गवरी नृत्य, फड़ चित्रकला जैसी विधा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली।
प्रो. पी. के. सिंह ने कहा कि जिस दौर में गवरी लेने वालों के विरूद्ध जाति निष्कासन, अर्थदण्ड जैसे आदेश जारी कर इस कला को समूल नष्ट करने का प्रयास किया जाता था उस दौर में डॉ. भानावत ने इस विधा को अपने शोध का विषय बनाकर पनुर्जीवन ही नहीं अपितु अनेकों को इस ओर काम करने के लिए प्रेरित किया। आज कई प्रांतों के अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा इन लोकसंस्कृति के विषयों पर अनेक छात्रों ने शोधानुसंधान द्वारा पीएच.डी. की उपाधियां प्राप्त की और अभी भी यह काम और अधिक उत्साह से जारी है। इस अवसर पर डॉ. पारूल दशोरा, डॉ. रेनु शर्मा, डॉ. आशा शर्मा, पुष्पराज मीणा, नरेश कंधारी, डॉ. अनिल शर्मा, डॉ. प्रकाशचन्द्र विजयवर्गीय सहित कई शोधार्थी उपस्थित थे। संचालन प्रोक्टर डॉ. देवेन्द्र श्रीमाली ने किया।

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