बनारस में राजस्थान : पुरातनता और परिवर्तन विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
उदयपुर। राजस्थान अपने पुरातन स्वरूप में परिवर्तन से तालमेल बनाए हुए हैं। यह वही भूमि है जिसने बूंद – बूंद का महत्व समझा और सरोवर के नाम से बस्तियों का विकास किया। यहां रण के रंग खिले, शूरवीरता और वचन पालन, स्त्री, गाय, मातृभूमि तथा अतिथि के सम्मान जैसे मूल्य सुरक्षित रहे हैं। इन मूल्यों की बदौलत यहां जन्म लेने वाले लोकदेवता बने। यहीं वह आबू है जहां विदेश से आए लोगों का भारतीय संस्कार हुआ जिसकी चर्चा लगभग सभी प्राचीन पुराणों में है।
यह बात वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने वाराणसी इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिस्ट्री की ओर से बनारस में आयोजित ” राजस्थान : पुरातनता और परिवर्तन ” विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के उदघाटन अवसर पर कही। दो दिवसीय यह संगोष्ठी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैदिक विज्ञान केंद्र में आरम्भ हुई।
संगोष्ठी का ऑन लाइन उद्घाटन हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल श्री कवीन्द्र गुप्ता ने किया और कहा कि राजस्थान अपनी गौरवशाली परंपराओं के लिए जाना जाता है। आज वह आधुनिक विज्ञान और तकनीक के लिए जाना जा रहा है। उन्होंने संगोष्ठी की सफलता के लिए शुभ कामनाएं दीं।
डॉ. जुगनू ने राजस्थान के नामकरण, यहां की सभ्यता और संस्कृति के प्रमुख तत्त्वों के मर्म को रेखांकित करते हुए कहा कि सरस्वती जैसी नदी के लुप्त होने पर राजस्थान ने भूमिगत जल की खोज की सारस्वत विद्या का आश्रय लिया और बस्तियों को जलस्रोत दिए। इस भूमि ने स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों को प्रेरणा दी। शिवाजी जैसे नायक ने महाराणा प्रतापसिंह को आदर्श माना और उनकी पद्धति से अपना राज्याभिषेक करवाया। इस भूमि ने आक्रांताओं को हर बार जवाब दिया। यहीं पर ज्ञान – विज्ञान की पांडुलिपियां सुरक्षित रहीं और खोजी गईं। गाय और ऊंट जैसा पशुधन और चांदी, जिंक जैसा धातुधन यहां की पहचान विश्वभर में स्थापित करता है।
उद्घाटन सत्र में विदेशी अध्येता कोइनरेड इलस्ट ने इस प्रदेश की विशेषताएं बताईं। प्रारंभ में इंस्टिट्यूट की संस्थापक निदेशक प्रो. अरुणा सिन्हा ने इस संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। संचालन डॉ. जय लक्ष्मी कौल ने किया और आभार श्रेया पाठक ने ज्ञापित किया। पहले दिन विभिन्न सत्रों में 34 शोध पत्र पढ़े गए।
युग युगीन मूल्य दिए राजस्थान की धरती ने : डॉ श्रीकृष्ण जुगनू
