चित्तौड़गढ़ (मुकेश मुंदड़ा )। जहाँ आज के दौर में अक्सर संवेदनहीनता की खबरें मन को विचलित करती हैं, वहीं चित्तौड़गढ़ जिला मुख्यालय स्थित महिला एवं बाल चिकित्सालय से एक ऐसी सुखद खबर आई है, जो मानवीय जिजीविषा और चिकित्सकों के समर्पण की मिसाल पेश करती है। चिकित्सालय की एसएनसीयू में मात्र 900 ग्राम वजन वाली एक नवजात बच्ची को यमराज के द्वार से सुरक्षित वापस लाकर उसे नया जीवन दिया है। डेलवास निवासी हेमलता ने गत 19 फरवरी को उदयपुर के एक निजी अस्पताल में समय से पूर्व एक पुत्री को जन्म दिया था। जन्म के समय बच्ची का वजन मात्र 900 ग्राम था और वह कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही थी। आर्थिक तंगी के चलते परिजन उसे निजी अस्पताल में रखने में असमर्थ थे, जिसके बाद उसे अत्यंत नाजुक स्थिति में चित्तौड़गढ़ के जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। जहां शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जयसिंह मीणा और उनकी टीम ने इस चुनौती को स्वीकार किया। बच्ची की हालत इतनी नाजुक थी कि परिजनों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी लेकिन एसएनसीयू स्टाफ ने हार नहीं मानी। पहले बच्ची को नली के माध्यम से आहार दिया गया, फिर स्थिति सुधरने पर पलाड़ी और अंत में प्रत्यक्ष स्तनपान सुनिश्चित किया गया। 55 दिनों तक चली इस लंबी जद्दोजहद में नर्सिंग स्टाफ और डॉक्टरों ने दिन-रात एक कर दिया।
माँ की ममता बनी ढाल :
इस पूरी जंग की असली सूत्रधार बच्ची की माँ हेमलता रही। जहाँ समाज में कई बार नवजातों को लावारिस छोड़ने जैसी घटनाएं सामने आती हैं, वहीं हेमलता ने अस्पताल परिसर में ही रहकर एक योद्धा की तरह अपनी बच्ची की सांसों की डोर थामे रखी। चिकित्सकों के मार्गदर्शन और माँ के अटूट विश्वास का ही परिणाम है कि आज वह कलेजे का टुकड़ा मुस्कुरा रहा है।
अब पूरी तरह स्वस्थ मासूम :
55 दिनों के सफल उपचार के बाद अब बच्ची का वजन 900 ग्राम से बढ़कर 1650 ग्राम हो गया है। चिकित्सकों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ घोषित कर डिस्चार्ज कर दिया है। डॉ. जयसिंह मीणा ने बताया कि एसएनसी यूनिट पूर्व में भी ऐसे कई बच्चों को नया जीवन दे चुकी है, लेकिन हेमलता का समर्पण समाज के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। जब विश्वास और सही उपचार का साथ मिलता है, तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। यह जीत केवल चिकित्सा विज्ञान की नहीं, बल्कि एक माँ के धैर्य की भी है।

