चित्तौड़गढ़ (मुकेश मूंदड़ा )। गंगरार थाना क्षेत्र में वर्ष 2022 में हुए सनसनीखेज सिर कटी लाश मामले में अपर सेशन न्यायाधीश संख्या 2 के पीठासीन अधिकारी विनोद कुमार बैरवा ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दो अभियुक्तों को हत्या और साक्ष्य मिटाने का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने प्रेम प्रसंग के चलते भाई की बेरहमी से हत्या करने के इस मामले में अभियुक्तों पर आर्थिक दंड भी लगाया है। घटना 5 दिसंबर 2022 की है, जब गंगरार स्थित किले की पहाड़ी पर हनुमान मंदिर के पीछे एक कुएं में अज्ञात युवक का सिर कटा हुआ धड़ मिला था। तलाशी के दौरान कुएं से ही कटा हुआ सिर भी बरामद किया गया। मृतक की पहचान 23 वर्षीय महेन्द्र रायका निवासी गरोठ, मंदसौर के रूप में हुई, जो उस समय अपने मामा शांतिलाल रायका के पास भाटखेड़ा गंगरार में रह रहा था।
प्यार के बीच रोड़ा बना भाई :
पुलिस जांच और अदालती सुनवाई में सामने आया कि मृतक महेन्द्र की बहन तनिष्का उर्फ तनु और अभियुक्त महावीर धोबी के बीच प्रेम प्रसंग था। तनु महावीर के साथ जाना चाहती थी, लेकिन भाई महेन्द्र इसका विरोध कर रहा था और अपनी बहन का विवाह अपनी ही बिरादरी में कराना चाहता था। इसी विरोध के कारण बहन और उसके प्रेमी ने मिलकर महेन्द्र को रास्ते से हटाने की साजिश रची।
दृश्यम स्टाइल में रची साजिश और वारदात :
वारदात को अंजाम देने के लिए आरोपियों ने फिल्मी पटकथा की तरह योजना बनाई। षड्यंत्र 16 नवंबर 2022 को तनु ने योजना के तहत भाई महेन्द्र को फोन कर गंगरार चौराहे बुलाया। महावीर धोबी अपनी वैन में महेन्द्र को बिठाकर क्षेत्र में किले के पास ले गया। वहां दोनों ने साथ बैठकर गांजा पिया। नशे की हालत में महावीर ने सारणेश्वर मंदिर के पास सुनसान जगह पर गमछे से महेन्द्र का गला घोंट दिया। शव की पहचान छुपाने के लिए उसका सिर धड़ से अलग कर हाथ-पैर बिजली के तारों से बांधकर रात के अंधेरे में किले के कुएं में फेंक दिया।
अति-आत्मविश्वास बना पुलिस का सुराग :
वारदात के बाद आरोपी महावीर पुलिस को गुमराह करने के लिए खुद पुलिस के साथ रहकर जांच में सहयोग करने का नाटक करता रहा, लेकिन जब पुलिस कुएं से लाश निकाल रही थी, तब पुलिस टॉर्च की रोशनी में मृतक के हाथ पर लिखा नाम पढ़ने की कोशिश कर रही थी। तभी महावीर ने हड़बड़ी में खुद ही मृतक का नाम बोल दिया। पुलिस को शंका हुई कि बिना चेहरा देखे बिना महावीर ने नाम कैसे जान लिया, और यही चूक उसकी गिरफ्तारी का कारण बनी।
अदालत का फैसला और दंड
अभियोजन पक्ष ने मामले को साबित करने के लिए 33 गवाह और 96 दस्तावेजी साक्ष्य पेश किए। महावीर धोबी और महेन्द्र धोबी दोनों को आईपीसी की धारा 302 हत्या, 201 साक्ष्य मिटाना और 120बी षड्यंत्र के तहत आजीवन कारावास और 70-70 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने मृतक की बहन को बरी कर दिया। न्यायालय ने मृतक के विधिक उत्तराधिकारियों को सरकार की ओर से उचित पीड़ित प्रतिकर राशि दिलाने के भी आदेश दिए हैं।

