ओंकारेश्वर में वंशावली लेखन प्रथा के संरक्षण का संकल्प

राजस्थान के राव, जागाओं के देशभर में हैं यजमान
उदयपुर।
राजस्थान और गुजरात सहित मालवा में वंशावली लेखन की ऐसी सुदृढ़ परंपरा रही है जो हर कुल के इतिहास के अनेक सूत्र सुरक्षित रखे हुए हैं। ओंकारेश्वर मांधाता क्षेत्र में संपन्न वंशावली और विरुदावली विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में इस परंपरा को सुरक्षित रखने और प्रोत्साहित करने का संकल्प हुआ। इसमें देशभर से पोथी वाचकों, कविराव, चारण, गढ़वी और महाराष्ट्र सहित दक्षिण के वंश वाचकों ने भाग लिया और कोई पचास शोधकर्ताओं ने अपने शोध सर्वेक्षण प्रस्तुत किए।


जनजाति लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, भोपाल की ओर से निदेशक प्रो. धर्मेंद्र पारे के मार्गदर्शन में यह तीन दिवसीय संगोष्ठी हुई। वंशावली वाचन विधि के बाद तकनीकी सत्र में अध्यक्ष पद से वरिष्ठ भारत विद्याविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने कहा कि हमारी वंशावलियां सांस्कृतिक एकता की सूत्रधार हैं। वे समाज के लिए निर्देशक और विधान तथा अनुष्ठानों की भूमिका वाली होती हैं। यह परंपरा हमारी जातीय पहचान वाली है और हमें जड़ों से जोड़ती है। विरुदावली यदि गौरवशाली शब्दों से हमें हमारी गौरवशाली विरासत से जोड़ती है तो दान, मान और त्राण के पथ को आलोकित करती हैं। इनकी जानकारी और महत्व की जानकारी सबको हो, इसके लिए यह आवश्यक है कि ये पाठ्य पुस्तक और शोध का हिस्सा बनें।


भारत में ऋषि वंश और राजवंश ही नहीं, सर्व सामान्य के वंश को सहेजने और लिखने की परम्परा रही है। सब ब्रह्मा की सृष्टि में मनु से उत्पत्ति मानी है और यह विश्वास हम सब को एक कुटुंब वाला सिद्ध करता है।
आयोजन में प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, बृजेन्द्र कुमार सिंहल, डॉ. शोभा सिंह, उमेश पाठक, विभा ठाकुर, इंद्र नारायण ठाकुर, आकांक्षा, प्रो. मोनिका ठक्कर, अध्येता काजल, डॉ. अनीता सोनी, डॉ. नेत्रा रावणकर, ज्ञानेश चौबे, छोगालाल सुजस, प्रो. योग्यता भार्गव आदि ने अपने शोध पत्र पढ़े। ओंकार मांधाता क्षेत्र में अपनी तरह का यह पहला आयोजन था। डॉ. सुखदेवसिंह राव और उनके साथियों ने वंशावली वाचन प्रस्तुत किए। किशोरदान चारण आदि ने युद्ध विषयक प्रेरक गीत सुनाए।

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