बच्चों के टीकाकरण में देरी न करें

उदयपुर। टीकाकरण बच्चों में बीमारियों की रोकथाम करने का सबसे प्रभावी व किफायती तरीका है। विश्व के सभी देशों में बीमारियों की रोकथाम के लिए व्यापक टीकाकरण की परियोजनाएं हैं। विशेषकर यह परियोजनाएं गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं व बच्चों के लिए चलाई जाती है। विश्वभर में करीब 27 बीमारियों के लिए टीकाकरण किया जाता है। कई अन्य बीमारियों के लिए टीके बनाने का कार्य चल रहा है। यह जानकारी पारस जे. के. हॉस्पिटल के नवजात रोग विशेषज्ञ डॉ. राजकुमार ने राष्ट्रीय टीकाकरण माह के तहत चलाये जा रहे जागरूकता कार्यक्रम में दी।
उन्होंने बताया कि भारत में व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम की शुरूआत 1978 से हुई थी। यह प्रोग्राम आज एक व्यापक रुप ले चुका है। भारत के टीकाकरण प्रोग्राम के तहत प्रतिवर्ष करीब 2.6 करोड़ नवजात व 2.9 करोड़ गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण को लक्ष्य बनाया गया है। इसी उद्देश्य के साथ यह कार्य निरतंर प्रगति पर है। टीकाकरण एक नवजात को वर्तमान से लेकर भविष्य में होने वाली बीमारियों से बचाता है। पारस जे. के. हॉस्पिटल में भी 15-20 बीमारियों का टीकाकरण किया जाता है। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं को भी टीकाकरण किया जाता है। शिशुओं में जन्म से लेकर 18 वर्ष तक की आयु तक टीके लगाये जाते हैं। जन्मते ही बच्चों को बी.सीजी., हैपेटाईटिस व ओ.पी.वी. के टीके लगते हैं। इसलिए बच्चों के टीकाकरण में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिये।
पारस जे. के. हॉस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनोज अग्रवाल ने बताया कि बच्चों को 12 वर्ष की आयु में जापानी दिमागी बुखार का टीका लगता है। उसके लिए भी हम डेटा बनाकर माता-पिता को देते हैं। समय पर फोन भी किया जाता है। यह रोग भारत के कुछ इलाकों में ज्यादा पाया जाता है। यह जापानी ऐन्सीफैलाइटिस वायरस के कारण होता है और 20-30 प्रतिशत मामले गंभीर होकर जानलेवा भी बन सकते हैं।

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