दिवेर युद्ध विजय: वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के जीवन का सबसे गौरवमय व स्वर्णिम पृष्ठ

मेवाड़ का निर्णायक युद्ध : दिवेर

उदयपुर, 26 अक्टूबर। हल्दीघाटी के युद्ध के करीब 6 वर्ष पश्चात दिवेर का युद्ध हुआ, जो की वास्तव में मुग़लों के साथ प्रातः स्मरणीय महाराणा प्रताप एवं मेवाड़ के लिए निर्णायक युद्ध था। दिवेर युद्ध के लिए महाराणा प्रताप ने बहुत ही सुनियोजित रचना से तैयारी की, जिसका सुखद परिणाम आक्रांताओं पर उनकी भव्य विजय के रूप में सामने आया और वह दिन विजयादशमी का था। यह विचार इतिहासकार नारायणलाल उपाध्याय ने मेवाड़ टॉक फेस्ट द्वारा आयोजित “ऐतिहासिक दिवेर विजय” विषय पर संवाद-परिचर्चा कार्यक्रम में व्यक्त किये।
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के जीवन का सबसे गौरवमय व स्वर्णिम पृष्ठ – दिवेर युद्ध के महत्व के बारे में उपाध्याय ने बताया एवं इस दौरान घटित एक घटना का वर्णन करते हुए कहा की, सुलतान खान से जब महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह युद्ध कर रहे थे तब अमर सिंह ने एक भाले के वार से सुलतान खान का वध किया था। भाला सुलतान खान के बाद उसके घोड़े को भी बींधता हुआ धरती में धंस गया था। सुल्तान खान को ऐसा लगा मानो किसी मनुष्य ने नहीं अपितु दैवीय शक्ति ने ये कार्य किया हो। इस घटना ने मुग़ल सेना में असीम भय का संचार किया और वह युद्ध का मैदान छोड़ कर भाग खड़ी हुई। मरते हुए शत्रु सुल्तान खान को गंगाजल पिलाकर महाराणा प्रताप द्वारा उसके लिए भी मोक्ष की कामना की गई, जो भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाती है।
अकबर ने इस विभत्स पराजय के बाद फिर कभी मुड़ कर मेवाड़ की ओर नहीं देखा। दो दिनों तक चले दिवेर युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने मुगलों की अधिकांश चौकियां और थाने नष्ट कर दिए, जब वे कुम्भलगढ़ के दुर्ग पर पहुंचे तो मुगल सेना वहां से युद्ध किए बिना ही पलायन कर चुकी थी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के उपाध्यक्ष एवं इतिहास संकलन समिति, उदयपुर के उपाध्यक्ष मदन मोहन टांक ने की, टांक ने बताया की ज्यादातर इतिहास में भारत को संघर्ष या गुलाम की मानसिकता सा दिखाया गया है बल्कि वास्तव में ऐसा नहीं है ऐसी कई घटनाओं से पता चलता है की भारत सदैव ही गौरान्वित रहा है और ऐसे विषय युवा, समाज तक पहुंचे ऐसी जरूरत भी है। भारत पहले भी विश्व गुरु था आज भी है जिसे हम अनुभव कर ही रहे है। टांक ने बताया की वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के लिए “वीर विनोद”, “राजप्रशस्ति” जैसी अनेक पुस्तकों में बहुत सुन्दर वर्णन मिलता है।

कार्यक्रम में एक सत्र प्रश्नोत्तर का हुआ, जिसमे उपस्थित प्रतिभागियों ने अपनी जिज्ञासा का समाधान किया। कार्यक्रम का सञ्चालन चंद्र प्रकाश जावरिया ने किया एवं धन्यवाद नरेश यादेव ने ज्ञापित किया। कार्यक्रम में डॉ मनीष श्रीमाली, डॉ बृज गोपाल, विकास छाजेड़, सुरेश चौहान, लक्मण सोलंकी, डॉ सतीश अग्रवाल आदि ने विचार व्यक्त किये।

अंत में कार्यक्रम की समन्वयक रुचि श्रीमाली ने मेवाड़ टॉक फेस्ट का परिचय देते हुए बताया की युवा पीढ़ी को विमर्श, कला, इतिहास और संस्कृति से जोड़ने के उद्देश्य से मेवाड़ टॉक फेस्ट विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करता है और इसी श्रृंखला में आगामी जनवरी माह में उदयपुर में चार दिवसीय कार्यक्रम रखने की योजना है, यो की युवा केंद्रित रहेंगे, जिसमे प्रमुख इतिहासकार, लेखक, विषय विशेषज्ञ, पुस्तक मेला, प्रतियोगिताएं, संवाद-परिचर्चा एवं मनोरंजन हेतु भी कई कार्यक्रम करवाए जायेंगे। इन कार्यक्रमों के द्वारा स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं को एक मंच मिलता है एवं प्रसिद्ध शिक्षाविदों एवं शोधकर्ताओं को सुनने का और उनके साथ संपर्क स्थापित करने का अवसर मिलता है।
उल्लेखनीय है की एमटीएफ द्वारा गत जनवरी माह में नेताजी सुभाष चद्र बोस की जन्म जयंती पर “सुभाष के सपनों का पराक्रमी भारत” थीम पर एक दिवसीय कार्यक्रम किया गया था।

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